Sunday, 30 June 2013
आम आदमी के नाम पर
Tuesday, 21 July 2009
समाचार – सदा सीरियस ही क्यों, सरस क्यों नहीं
मगर समाचार सदा सीरियस ही हों, ये ज़रूरी नहीं, कभी-कभी सीरियस समाचार भी सरस हो जाया करते हैं, गुदगुदा जाते हैं, खिलखिला जाते हैं, समाचार बननेवालों को भी, बनानेवालों को भी और समाचारभोगियों को भी।
लंदन में हाल के समय में ऐसी तीन घटनाएँ हुईं जिन्हें बनना तो चाहिए था सीरियस लेकिन वो बन बैठे सरस।
पहली घटना –
इस घटना के नायक हैं लंदन के मेयर साहब जो मीडिया में छाए रहते हैं, नाम है बोरिस जॉन्सन, पढ़ाई-लिखाई अभिजात परंपरा वाले ईटन कॉलेज और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से की है, थोड़ी केयरलेस टाइप छवि है उनकी - केशों को कंघों से बचाए रखते हैं; सड़कों पर सुबह-सुबह हाफ़पैंट-स्पोर्ट्स शू में दौड़ लगाते हैं, बारिश-बरफ़ से भी नहीं रूकते; दफ़्तर जाते हैं तो दुपहिया साइकिल पर, हेलमेट लगाए; मिला-जुलाकर कहा जाए तो मीडिया के लिए एक अलग टाइप के कैरेक्टर हैं श्रीमान बोरिस जॉन्सन – महापौर-ए-लंदन।
और अलग टाइप के बोरिस साहब के साथ अलग ही तरह की कुछ घटनाएँ भी होती रहती हैं।
हाल ही में उन्होंने लंदन में एक छोटी-सी गंदलाई नालानुमा नदी की सफ़ाई के लिए बड़े ज़ोर-शोर से अभियान छेड़ा, पाँवों में बरसाती जूते, एक हाथ में डंडेवाला झाड़ू, दूसरे में कचरा डालने का पॉलिथीन बैग थामे मेयर साहब स्वयँ नदी की सफ़ाई में जुट गए – ताकि उनकी देखा-देखी आमलोग भी इस पावनकर्म में हाथ बँटाएँ।
सारे कैमरे उनके इस करतब को देखने के लिए उनकी ओर तने थे, मेयर साहब रंग-बिरंगी गंदगियों को छानते-बीनते आगे बढ़े आ रहे थे, कि तभी उनके पैर लड़खड़ाए, उन्होंने संभलने की कोशिश की, जो विफल रही, और एकक्षण में लंबे-चौड़े बोरिस जॉन्सन ने धप्प से सीधे गंदे पानी के भीतर आसन जमा लिया।
मीडियाकर्मी पहले चौंके, फिर चहके और फिर चिल्ला पड़े – आज तो हेडलाईन मिल गई।
बाद में मीडियाकर्मियों के सामने आकर मुस्कुराते मेयर महाशय ने ख़ुद ही पूछा – मुझे उम्मीद है आप सबको बढ़िया शॉट मिला आज।
किसी पत्रकार को लेकिन चुहल सूझी और उसने पूछ डाला - सर पानी कैसा था?
मेयर महाशय बोले – पानी बड़ा ताज़गी देनेवाला था और मैं कहूँगा कि बाक़ी लोग भी डुबकी लगाएँ।
(महापौर की महाडुबकी का वीडियो देखें)
दूसरी घटना -
इस घटना के नायक हैं ब्रिटेन के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी, मेट्रोपोलिटन पुलिस के कमिश्नर – सर पॉल स्टीफ़ेंसन।
कमिश्नर साहब ने कुर्सी संभाली, कोई दो-तीन महीने बाद उनको ख़याल आया कि कुछ ऐसा किया जाए जिससे सबको पता चले कि वे क्या हैं और उनकी पुलिस क्या है।
तो उन्होंने तैयारी की एक छापे की, छापे का निशाना था एक ऐसे गिरोह का सरगना जिसने एक इलाक़े के घरों में चोरियाँ कर आतंक मचाया हुआ था।
गोधूलि बेला का अँधियारा था, मार्च का महीना, कड़ाके की ठंड – और ऐसे में 80 से अधिक पुलिसकर्मी, एक हेलिकॉप्टर, भांति-भांति के यंत्र-उपकरण-शस्त्र, और एक स्थानीय पत्रकार - इन सबको लेकर कमिश्नर साहब चल पड़े छापा मारने।
और जब संदिग्ध के घर का दरवाज़ा तोड़ अंदर खोज-बीन हुई तो पहले पता चला कि वो संदिग्ध वहाँ नहीं है, और थोड़ी देर बाद ये भी पता चला कि वो कहाँ है - वो संदिग्ध हवालात में था, पुलिस ने उसे एक दिन पहले ही पकड़ लिया था, आधी रात को।
पत्रकारों ने बाद में कमिश्नर साहब से पूछा – कैसा रहा छापा?
कमिश्नर साहब बिना शर्माए बोले – बहुत अच्छा, बहुत सारी सूचनाएँ और सबूत मिले।
पत्रकारों ने पूछा – और वो जिसे पकड़ने गए थे?
कमिश्नर साहब ने कहा – मुझे ख़ुशी है कि पुलिस ने उसे पकड़ लिया, ये हर्ष करनेवाली बात है, दिखाती है कि हमारी पुलिस कितनी मुस्तैद है!
तीसरी घटना –
इस घटना के भी मुख्य किरदार हैं लंदन के महापौर बोरिस जॉन्सन.
लंदन के विख्यात चौराहे ट्रैफ़ेल्गर स्क्वायर के चार कोनों पर चार खंभे हैं, तीन पर मूर्तियाँ लगी हुई हैं, मगर चौथा खंभा दिलचस्प है – वो लंबे समय से ख़ाली पडा है क्योंकि वहाँ क्या होना चाहिए इसपर बहस चल रही है, जो अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकी है.
चौथे खंभे पर अस्थायी रूप से कुछ-कुछ होता रहता है, अभी वहाँ एक मूर्तिकार की परिकल्पना पर एक अलग तरह का आयोजन चल रहा है, खंभे पर एक आम व्यक्ति खड़ा रहता है, हर घंटे पर उसकी जगह दूसरा व्यक्ति आ जाता है, सौ दिनों तक ये सिलसिला चलेगा, 2400 लोग खंभे पर बारी-बारी से खड़े रहेंगे, और खंभे पर चढ़ने के लिए आवेदन करनेवाले लोगों की संख्या है - लगभग 15 हज़ार!
इस आयोजन का शुभारंभ मेयर के कर-कमलों से होना था, मेयर उदघाटन भाषण देने जा रहे थे, सामने दर्शक विराजमान थे कि तभी कुछ हलचल हुई।
लोगों ने देखा, एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति हिरण की गति से दौड़ता हुआ आया, चीते सी छलाँग लगाई और देखते-देखते चिंपांजी की तरह झूलता हुआ खंभे पर जा चढ़ा और हाथ में रखा एक बैनर दिखाने लगा – उसपर तंबाकू विरोधी नारा लिखा था।
अब मेयर, मूर्तिकार और खंभे पर सबसे पहले चढ़ने की तैयारी करनेवाली महिला हक्के-बक्के उसे देखे जा रहे हैं, खंभे पर चढ़ा व्यक्ति उनको घूरे जा रहा है।
आखिर मुस्कुराते मेयर साहब ने बात संभाली, बोले – यही तो हम चाहते हैं, यही तो कला का लोकतंत्रीकरण है!
डाँट की जगह मिले इस दुलार से खंभे पर चढ़े तंबाकू-विरोधी-कार्यकर्ता का उत्साह दोगुना हो गया और उसने ऊपर से ही कहा – मुझे भी माइक दीजिए, मुझे भी कहना है।
मगर उसे माइक नहीं दिया गया, कहा गया – माइक लाना है तो अपना माइक लाओ, और अब कृपा कर नीचे उतरो, जिस महिला को उदघाटन करना था, वो क्रेन पर खड़ी इंतज़ार कर रही है।
फिर क्रेन ऊपर आई, महिला खंभे पर चढ़ी, और कार्यकर्ता नीचे उतर आया - क्रेन से।
(अनूठी कला के समय हुई अनूठी कलाबाज़ी का वीडियो देखें)
अब बताएँ – ये सीरियस बनने गए समाचार सरस बन बैठे कि नहीं?
याद पड़ता है – कुछ समय पहले एक सभा में वरूण गांधी स्टेज लिए-दिए ज़मीन पर आ बैठे थे, मगर ये घटना भी सीरियस समाचार बनकर रह गई – समाचार बननेवाले भी सीरियस रहे, समाचार बनानेवाले भी सीरियस, रहा सवाल समाचारभोगियों का - तो जिनके भीतर भी सरसता-सृजक तत्व होगा वो तो अवश्य एक क्षण खिलखिलाए होंगे।
Tuesday, 25 November 2008
दिख रही है बदलाव की बयार
लंदन में गोरियों के साथ लटपटाए ओवरकॉन्फ़िडेन्ट देसी नौजवानों का दिखना या गोरों के साथ खिखियाती देसी नवयुवतियों का दिखना भी सामान्य सी बात है।
लंदन में हेलो-थैंक्यू-नो प्रॉब्लेम टाइप के शब्दों से सज्जित ठेठ देसी अंग्रेज़ी में हैटधारी गोरे साहबों के साथ पिटपिटाते नॉन-कॉन्फ़ि़डेन्ट देसी भद्रजनों का दिखना भी एक सामान्य बात है।
लेकिन ऐसे देसी युवक-युवतियाँ-भद्रजन जिनके साथ बतिया रहे हैं, या लटपटा रहे हैं, उस किरदार का रंग गोरा ना होकर काला हो तो ये बात थोड़ी असामान्य होगी।
पता नहीं कद-काठी का भय है, या संस्कृति के अंतर से उपजा विलगाव, या भीतर कहीं समाया रंगभेद या फिर गोरे रंग के लिए जीन में दबा पड़ा दासता का भाव - ब्रिटेन में काले लोगों से भारतीयों की बहुत नहीं बनती - ये बात काले भी समझते हैं, भारतीय भी।
भारतीयों को दिखाई देता है कि झाड़ू लगाने, कचरा उठाने, टॉयलेट साफ़ करने, पहरेदारी करने जैसे ग़ैर-तकनीकी कामों में जितनी संख्या में काले हैं उतने दूसरे नहीं।
दफ़्तरों में कहीं कोई काला नहीं दिखता जो किसी बड़ी ज़िम्मेदारी वाले पद पर बैठा हो, जेनरल स्टोर्स में भी काउंटर पर अपने गुज्जू-पंजाबी दिखाई देते हैं या तमिल-बांग्लादेशी।
कुल मिलाकर जिस मोटे तरह से कहा जा सकता है कि भारतीय क्या काम करते हैं, या पाकिस्तानी-बांग्लादेशी क्या काम करते हैं, या तमिल-सिंहला, या गोरे, उस मोटे तौर से कहना बड़ा मुश्किल है कि काले लोग क्या काम करते हैं।
दूसरी तरफ़ मार-धाड़-ख़ून-ख़राबे की घटनाओं के साथ काले लोगों की छवि वैसे ही जुड़ी है जिस तरह से भारत में बम धमाकों के साथ मुसलमानो की छवि।
फिर कमर और घुटनो के बीच जाँघ के किसी हिस्से पर पैंट लटकाकर रंग-बिरंगे अंडरवियरों की प्रदर्शनी करने की कला के कारण भी काले भारतीयों की निगाहों में कलंकित होते रहते हैं।
और भारतीयों को तेल में सीझे और सने खाने की दूकानों के अस्वास्थ्यकर व्यंजनों का उपभोग करते जिसतरह से काले दिखाई देते हैं उसतरह से दूसरे नहीं दिखाई देते।
और पढ़ाई-लिखाई का मामला हो, तो हर बार अख़बार में कोई ना कोई भारतीय चेहरा दिख जाएगा मैट्रिक-इंटर(जीसीएसई-ए लेवल) की परीक्षाओं के टॉपरों की सूची में, मगर काले छात्र-छात्राओं के चेहरे दिखें, इस बात की संभावना कम ही रहती है।
ट्रेनों में भी जिस तरह से गोरे साहब-मेम या अपने देसी लोग अख़बार-मैग्ज़ीन-किताब पढ़ते नज़र आ जाते हैं, उस तरह से काले तो कभी नहीं दिखते, बहुत हुआ तो मुफ़तिया या किसी के छोड़े हुए अख़बारों को पलटते दिखाई दे जाएँगे काले पैसेंजर।
और हाँ, घूमने-घामने की जगहें हों, जहाँ पर्यटकों की भरमार हो, वहाँ भी भीड़ में नज़रें घुमाने पर गोरे दिखते हैं, चीनी-जापानी दिखते हैं, भारतीय दिखते हैं, मगर कालों का दिखना दुर्लभ ही होता है।
मिला-जुलाकर भारतीयों के मन में काले लोगों की एक सामान्य छवि यही बनती है कि काले लोग पिछड़े हैं, गोरों या भारतीयों की तरह सभ्य नहीं, गोरों और भारतीयों की तरह संपन्न नहीं।
पर पिछले एक हफ़्ते में दो दिन ऐसे आए जब लगा कि कहीं कुछ बदल रहा है शायद।
पहली घटना - रात का समय, मैं दफ़्तर से घर जा रहा हूँ, ट्रेन में इक्के-दुक्के लोग बैठे हैं, सामने की सीट पर एक काला व्यक्ति बैठा है, 40 के आस-पास की उम्र है, वो एक किताब पढ़ रहा है, पूरी तन्मयता के साथ, तमाम स्टेशन आए, वो पढ़ता ही रहा, फिर एक स्टेशन पर उसने किताब बंद की, बाहर निकला, ट्रेन चल पड़ी, मैंने खिड़की से देखा, वो किताब पढ़ते-पढ़ते ही प्लेटफॉर्म पर बाहर के दरवाज़े की ओर बढ़ रहा है।
दूसरी घटना - दिन का समय, मैं घर से दफ़्तर जा रहा हूँ, प्लेटफ़ॉर्म पर थोड़ी भीड़ है, ट्रेन सात-आठ मिनट बाद आएगी, बगल में खड़ा एक काला व्यक्ति एक किताब पढ़ रहा है, तन्मयता के साथ, लोग आ रहे हैं-जा रहे हैं, वो किताब पढ़े जा रहा है, ट्रेन आ रही है, वो तब तक पढ़ना बंद नहीं करता जब तक ट्रेन बिल्कुल रूक नहीं जाती, वो ट्रेन के भीतर जाता है, फिर से पढ़ाई में जुट जाता है।
दोनों कालों के हाथ में जो किताब थी, उसका शीर्षक था -"ड्रीम्स फ़्रॉम माई फ़ादर Dreams From My Father" - एक आत्मकथात्मक संस्मरण, उस व्यक्ति का, जो नए साल के पहले महीने की 20 तारीख़ से वाशिंगटन के व्हाइट हाउस में डेरा डालने जा रहा है।
पाँच नवंबर को उसकी जीत को चहुँओर बदलाव का नाम दिया गया। अमरीका से उठी बदलाव की वो बयार लंदन में बहती दिखाई दे रही है, निश्चित ही दूसरी जगहों पर भी बह रही होगी।
Friday, 14 November 2008
पर्दे पर चाय-पानी पिलानेवाले वे बच्चे
"कौन सा? वो बच्चे वाला? जब वो ट्रेन से जा रहा है?"
जवाब हाँ ही है जो सुनाई नहीं, दिखाई देता है - सिर दाएँ-बाएँ हिलता है, आँखें चौड़ी हो जाती हैं, कुछ इस भाव से मानो मोहन भार्गव को पानी का कुल्हड़ थमाते उस बच्चे का वो दृश्य साकार हो उठा हो। सिर मेरे मित्र का था, आँखें भी उसी की थीं।
स्वदेस अधिकतर लोगों ने तो देखी ही होगी, और लंदन-अमरीका-कनाडा के भारतीयों और भारतवंशियों ने तो कर्तव्यभाव से देखी होगी।
दृश्य सचमुच सुंदर है - संवेदनशीलता जगाउ।
फिर एक और फ़िल्म आती है - तारे ज़मीन पर। उसका भी एक दृश्य है, आमिर ख़ान किसी ढाबे पर बैठे हैं, बच्चा चाय लेकर आ रहा है, और फिर अगले दृश्य में रामशंकर निकुंभ के साथ बैठकर चाय में बिस्कुट बोरकर खा रहा है।
एक और संवेदनशीलता जगाउ सीन। कईयों के लिए नैन-भिगाउ सीन।
मगर सिनेमाई दुनिया से बाहर आते ही संवेदनशीलता का ये स्विच सीधे ऑफ़ हो जाता है।
चाय-पानी पिलानेवाले किसी बच्चे को देखकर आँसू आते हैं? चलिए शुरूआत मैं ही करता हूँ - मेरी आँखों से नहीं आते।
बाल श्रम की बहस बेमानी है क्योंकि तमाम चीख-चिल्लाहट के बावजूद बाल-श्रम अभी ख़त्म तो हुआ नहीं? ख़तम हो जाता तो स्वदेस और तारे ज़मीन पर के नैन-भिगाउ सीन कहाँ से आते?
किसी अंग्रेज़ी फ़िल्म में कभी किसी बच्चे को चाय-पानी पिलाते देखा है?
नहीं ना? तो फिर बाल-श्रम जब ख़त्म होगा तब होगा। अभी वो है, हर दिन दिखता है, हर तरफ़ दिखता है - चाय-पानी पिलाते हुए, रेल पटरियों पर कूड़ा बटोरते हुए, सभ्य घरों में बर्तन और फ़र्श चमकाते हुए।
क्यों नहीं आँखें भीजतीं इन बच्चों को देखकर? और हाँ ये बच्चे कोई - यादों की बारात - के कानों तक बाल बढ़ाए जूनिर आमिर ख़ान जैसे बच्चे नहीं हैं, जिनका पर्दे के बच्चों से कोई मेल ही ना हो। ये बच्चे तो स्वदेस और तारे ज़मीन पर के रियलिस्टिक बच्चे लगते हैं।
क्यों नहीं ऑन होता संवेदनशीलता का स्विच इन रियललाइफ़ बच्चों को देखकर?
जब सिनेमा का आविष्कार हुआ तो मैक्सिम गोर्की ने कहा था - "आज का मानव अपने दैनन्दिन जीवन की सामान्य घटनाओं से विशेष उद्दीपन महसूस नहीं करता। मगर इन्हीं घटनाओं की जब नाटकीय प्रस्तुति होती है तो उससे वही मानव हिल जाता है। मुझे भय है कि एक दिन चलचित्र की ये दुनिया, वास्तविक दुनिया पर भारी पड़ेगी और मानव के मन-मस्तिष्क पर अधिकार कर लेगी।"
कोई सौ साल पहले का गोर्की का भय सही था ना?
Thursday, 13 November 2008
एक लेखकाना शाम
नवंबर है, हवा तेज़ है, सर्द है, लेकिन मन में ना जाने कहाँ से गुलज़ार की मीठी धूप वाला ख़याल आ गया, ठंड मीठी लगने लगी - समझ गया, आज दिल लेखकाना हो रहा है।
परिभाषानुसार और परंपरानुसार लेखकों की फ़ितरत भीड़ से अलग होनी चाहिए, तो भीड़ जहाँ दफ़्तर से चार क़दम दूर बसे रेलवे स्टेशन में घुसी जा रही थी, मुझमें समाए लेखक ने मुझे चार किलोमीटर दूर एक दूसरे रेलवे स्टेशन की ओर मोड़ दिया - होठों पर गुनगुनाहट, आँखों में ऑब्ज़र्वेशन, मस्तिष्क में सोच और आत्मा में लेखक को बसाए हम चल पड़े भीड़ से अलग, एक लेखकीय सफ़र पर।
स्टेशन आ गया, शाम का समय है, दफ़्तर छूटने का समय, कर्मरत प्राणी उस दिन के कर्म के संपादन के बाद रेलगाड़ियों की ओर भागे जा रहे है, डेली पैसेंजर्स गाड़ी किस प्लेटफ़ॉर्म पर लगी है ये पढ़ने के लिए भी नहीं रूकते, चलते-चलते ही स्क्रीन पढ़ लेते हैं, जो धुरंधर हैं वे भीड़ में भी आड़े-तिरछे होकर उसी कौशल से सरसराते आगे बढ़े जा रहे हैं जिसतरह पटना के बाकरगंज रोड पर लगे जाम के दौरान दो चक्कों वाले वाहनों के सवार तीन-चार चक्कों पर लदी सवारियों से आगे निकल जाते हैं।
अधिकतर लोगों के हाथ में शाम में बँटनेवाले मुफ़तिया अख़बार हैं, जिनमें एक-दो ख़बरें पढ़ने को और दसियों देखने को मिल जाती हैं, कोई उनको देखते-देखते चल रहा है तो कोई चलते-चलते उनको देख रहा है...और उस शाम को कुलबुलाया एक लेखक चल भी रहा है और देख भी रहा है - भीड़ की तरह अख़बार को नहीं, अख़बार थामी भीड़ को।
कोई भागनेवालों की निगाह में धीमे चल रहा है, तो कोई धीमे चलनेवालों की निगाह में भाग रहा है, लेकिन भीड़ ट्रेन की ओर बढ़ी जा रही है, उसमें वेग है, गति भी और दिशा भी।
मगर इस वेग के बीच एक जगह कुछ ठहरा हुआ दिखाई दे रहा है, भीड़ आगे जाकर थोड़ा दाएँ-बाएँ ख़िसक रही है, फिर वेगवान हो जा रही है।
थोड़ा समीप जाता हूँ, देखता हूँ, एक विकलांग है, आगे बढ़ रहा है, ठहर जा रहा है, उसका संतुलन नहीं बन पा रहा।
और आगे जाता हूँ, वो केवल शारीरिक विकलांग ही नहीं, दिमाग़ी तौर पर भी विकलांग है, कभी इधर देख रहा है, कभी उधर देख रहा है, मगर समझ में नहीं आ रहा, क्या देख रहा है, साथ कोई नहीं है।
मैं एक पल उसे देखता हूँ, सामने लगी घड़ी देखता हूँ, प्लेटफ़ॉर्म देखता हूँ, वहाँ खड़ी ट्रेन देखता हूँ, उसकी ओर लपकती भीड़ देखता हूँ, एक बार फिर घड़ी देखता हूँ - और सात मिनट बचे हैं ट्रेन के छूटने में।
मगर आज तो मैं भीड़ का हिस्सा नहीं, जो सब करेंगे वो नहीं करना है, उसपर से सामने चारों ओर छितराए वैभव, आधुनिकता, विकास और सुंदरता को चुनौती देनेवाला एक कैरेक्टर खड़ा है, सभ्यजन क्या करते हैं, इसे देखने का इतना बड़ा अवसर क्या हाथ से जाने दिया जा सकता है - सामान्य दिन होता तो बात अलग थी, आज तो मेरे भीतर लेखक समाया था, उसने आगे बढ़ने से रोक दिया - ट्रेन जाती है तो जाए, आधे-एक घंटे देर ही होगी ना, अगली ट्रेन से ही सही।
मैं और मेरे भीतर समाया लेखक एक कोने में दीवार से सट गए, ऐसे जहाँ से विकलांग दिखाई भी दे, और भीड़ का रास्ता भी ना रूके।
भीड़निर्माता एक के बाद एक करते बढ़ रहे हैं, विकलांग भी बढ़ रहा है, रूक रहा है, लेकिन भीड़ का कोई भी अंश रूकना तो दूर ठिठक भी नहीं रहा। एक क्षण मेरे भीतर भी कर्तव्यबोध की टीस उठती है, कि लेखकीय चोले को त्याग उस विकलांग की सहायता की जाए, लेकिन एक तो कमज़ोर इच्छाशक्ति, दूसरा लेखकीय उत्कंठा - कि भीड़ क्या करती है, ये सोचकर मैं जहाँ हूँ वहीं बना हूँ।
विकलांग अचानक रूकता है, इस बार उसके ठीक बगल में एक भारतीय साहब खड़े हैं जिन्हें मैं देख रहा हूँ कि बड़ी देर से खड़े हैं, चेहरे पर अतिगंभीर भाव लिए, कभी अख़बार पलट रहे हैं, कभी टीवी स्क्रीन पर ट्रेनों की समयसारिणी देख रहे हैं, मगर पीछे नही् देख रहे जहाँ से विकलांग आ रहा था और अब उनके ठीक बगल में इधर-उधर सिर घुमाता, मुँह हिलाता खड़ा है।
भारतीय साहब ने नैनों के दृष्टि क्षेत्र के विस्तार में विकलांग को देखा, फिर इधर देखा-उधर देखने लगे और पन्ने पलटने लगे।
प्लेटफ़ॉर्म के ठीक गेट के पास खड़ी एक काली युवती भी बार-बार पीछे की ओर देख रही है, चेहरे पर दया है उसके, लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि वो उस विकलांग को देखने के लिए पीछे मुड़ रही है और इस कारण द्रवित है, या किसी और को देखने के लिए पीछे मुड़ रही है और उसका चेहरा ही करूणामय है।
वो फ़ोन निकालती है, किसी से बात करती है, क्या कहती है पता नहीं, लेकिन फिर वो ट्रेन की ओर बढ़ जाती है। मतलब लगता तो यही है कि वो उस विकलांग को नहीं देख रही थी। मतलब ये भी कि जिनका चेहरा करूणामय हो, वो सचमुच करूण हों, ये ज़रूरी नहीं।
प्लेटफ़ॉर्म से पहले लगे गेट के पास नेवी ब्लू पैंट, स्काई ब्लू कोट और स्काई ब्लू टोपी लगाए, एक रेलवे कर्मचारी भी तो खड़ा है, वो क्यों नहीं कोई मदद कर रहा है उस विकलांग की। देख तो रहा है वो उसकी ओर? लेकिन हो सकता है पहले भी ऐसी स्थिति से पाला पड़ा हो उसका, क्योंकि चेहरा तो अनुभव से तपा हुआ लगता है उसका। ख़ैर वो जहाँ है वही हैं, मैं भी जहाँ हूँ वहीं हूँ। इस बीच वो भारतीय महाशय ट्रेन की ओर बढ़ चुके हैं, शायद घड़ी के सात बजाने की प्रतीक्षा कर रहे थे, सात बजे के बाद जाने पर डेढ़ पाउंड की बचत हो सकती है।
आख़िर वो विकलांग टिकट खिड़की की ओर बढ़ रहा है, इसका मतलब उसे इतना अंदाज़ा तो है कि जाना किस तरफ़ है, मैं एक निगाह खिड़की के पीछे बैठे रेल कर्मचारी पर डालता हूँ जो सामान्य अँग्रेज़ लग रहा है और जो विकलांग की ओर देख भी रहा है, लगता है कि वो उस विकलांग की सहायता अवश्य करेगा।
फिर में एक निगाह घड़ी पर डालता हूँ जो कह रही है कि केवल दो मिनट रह गए हैं ट्रेन छूटने में - फिर मैं भी आगे बढ़ जाता हूँ।
स्थिति वही है जो अंतिम समय में ट्रेन में चढ़ते हुए होती है - भीड़ - मैं भीड़ में समा जाता हूँ, एक सीट के बगल में खड़ा हो जाता हूँ, कुछ ही क्षणों में पीं-पीं-पीं-पीं के साथ दरवाज़ा बंद होता है, ट्रेन चल पड़ती है।
ट्रेन में अधिकांश लोग पढ़ रहे हैं, चुपचाप, कोई मुफ़तिया बँटनेवाला अख़बार तो कोई दफ़्तर से टीपा हुआ अख़बार, कोई नोवेल थामे बैठा है तो कोई मैगज़ीन, तो कोई आईपॉड से बरसती हुई धुन में मगन है।
मैं भी अपने बैग से निकालता हूँ कुछ पन्ने - निर्मल वर्मा की एक कहानी और बाबा नागार्जुन की एक कविता - 'नया ज्ञानोदय' के नवंबर अंक में छपी है, इंटरनेट पर फ़्री है, कुछ पन्ने छाप लाया हूँ।
भीड़ भी पढ़ रही है, मैं भी पढ़ रहा हूँ - पर पता नहीं क्यों आज उस लेखकाना शाम को लिखे जानेवाले और पढ़े जानेवाले शब्दों पर संदेह-सा हो रहा है।
Wednesday, 8 October 2008
उल्टा तिरंगा और एक आम आदमी
कहानी कुछ यूँ बनती है कि पिछले महीने की एक शाम आम आदमी का खाना-वाना खाकर गाना-वाना सुनने का दिल आया,चैनलबाज़ी शुरू हुई, एक चैनल पर आकर रिमोट के बटनों पर जारी एक्यूप्रेशर बंद हुआ, पर्दे पर एक चैनल आकर ठहर गया, मुफ़्त चैनल है, सो पॉपुलर है। ब्रिटेन में भारतीय चैनलों को देखने के लिए सोचना भी पड़ता है, क्योंकि इसके लिए पैसे लगते हैं, तो सोचना तो पड़ता ही है, कि चैनल हर माह आपके दस पाउंड हड़प ले, इसका हक़दार है कि नहीं।
बहरहाल जिस चैनल की चर्चा हो रही है, वहाँ गानों पर गाने चल रहे थे, कभी द्रोणा-कभी फ़ैशन-तो कभी सज्जनपुर। और फिर वही हुआ जो अक्सर होता है,शुद्ध बंबईया गानों के बीच एक अशुद्ध म्यूज़िक वीडियो की घुसपैठ! अभिषेक-अक्षय-सलमान और प्रियंका-बिपाशा-करीना के गानों के बीच ना जाने कौन लोग, कहाँ के लोग, और क्या करते हुए लोग - आते हैं, नाच-गाकर भाग जाते हैं, आम आदमी को मजबूरन झेलना पड़ता है।
तो उस रात ऐसा ही हुआ, घुसपैठ हुई। जींस-टीशर्ट पहने और उल-जुलूल बाल बनाए या बिखेरे, दो लड़कों ने गाने की कोशिश शुरू कर दी, गाने के बोल थे - "लेट्स यू-एन-आई-टी-वाई, लेट्स पी-ए-आर-टी-वाई" - यानी आओ यूनिटी करें और पार्टी करें। और ये यूनिटी किसकी? भारत और पाकिस्तान की? यूटोपियाई सोच!!!
लड़के जहाँ गा रहे थे वो कोई छोटी हॉलनुमा जगह थी, कोट-पैंट-टाई में सज्जित लोग बैठे थे, चेहरों के भाव ऐसे, मानो गीत-संगीत की महफ़िल में नहीं विश्वव्यापी आर्थिक मंदी की चर्चा के लिए बैठे हों। तो दीवार के साथ सटी कुर्सियों पर ये सज्जन बैठे थे, दीवारों पर दुनिया भर के एकता और मैत्री के राग अलापते पोस्टर और झंडे - तिरंगे,चाँद-तारे और यूनियन जैक। आगे कमर थिरकाते, गाने की कोशिश करते दो नौजवान - लेट्स यू-एन-आई-टी-वाई, लेट्स पी-ए-आर-टी-वाई!!!
तभी एक हाथ में भारत और पाकिस्तान का ध्वज लिए, कदमताल करती, छोटी स्कर्ट पहने, डांस करने को आतुर, थिरकती हुई दो बालाओं ने हॉल में प्रवेश किया...और...हा दुर्भाग्य - भारत का उल्टा तिरंगा!!!
बहरहाल उसी उल्टे तिरंगे को बाला ने पाकिस्तानी तिरंगे से यूँ छुआया जैसे राम-भरत गले मिल रहे हों।
आम आदमी को काटो तो ख़ून नहीं, इतनी भारी-भरकम जनता बैठी है, उनके सामने गाने की शूटिंग हुई, एडिटिंग हुई, चैनल से पास करवाया गया, अब एयर भी हो रहा है और किसी ने नहीं देखा! और ये तब जबकि गाने के असल हीरो भारत-पाकिस्तान हैं!!!
अगले दिन चैनल लगाया, फिर वही बेशर्म तमाशा चल रहा है। अब आम आदमी के आत्मसम्मान और आत्मगौरव का तो पता नहीं, मगर क्रोध ज़रूर जाग गया जो पिछले लंबे समय से बंबईया महफ़िलों में इन अज्ञातप्राणियों की घुसपैठ पर उबल रहा था।
आम आदमी ने भारतीय उच्चायोग की वेबसाइट खोली, वहाँ से पते जुटाए और एक ई-मेल लिखा - लंदन स्थित भारत के उच्चायुक्त को, उप-उच्चायुक्त को, ब्रिटेन के तमाम वाणिज्यिक दूतावास अधिकारियों को, सांस्कृतिक मंत्री को, हिंदी अधिकारी को और प्रेस अधिकारी को - घटना का वर्णन, चैनल का पता ठिकाना, और परिचय - एक आम भारतीय नागरिक।
ई-मेल भेज दिया गया, लेकिन उसका ना कोई लिखित जवाब आया ना ही ऑटोमेटेड जवाब...
दो सप्ताह बाद एक ई-मेल आया है भारतीय दूतावास से - "...आपको ये बताना है कि आपकी शिकायत के बाद हमने चैनलवालों से संपर्क किया, उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है और तत्काल गाने को हटा लिया है। आपने हमें इस घटना के बारे में बताया, हम इसके लिए आपके आभारी हैं..."
आम आदमी को एक पल के लिए लगा कि आम धारणा सत्य तो होती होगी ही, लेकिन उसे ध्रुवसत्य मान बैठते तो शायय ये ख़ास अनुभव ना होता।
Tuesday, 7 October 2008
ब्रिटेन के आज़मगढ़ से एक डायरी
पर जब पहली बार लंदन से लीड्स पहुँचा तो दोनों ही शहरों की छवियाँ कुछ और रूप ले चुकी थीं - लंदन- जिसने बमों की मार सही और लीड्स- जिसने बम बरसानेवाले भेजे।
सात जुलाई 2005 को आतंकवाद के असुर ने लंदन पर पहली बार प्रहार किया, 50 से अधिक मासूमों को निगल गया, और ना केवल लंदन बल्कि सारे ब्रिटेन के माथे पर एक गहरा घाव छोड़ गया।
लीड्स गया था हमले की पहली बरसी पर रिपोर्टिंग करने, ये देखने कि कैसे झेल रहा है ये शहर अपने ऊपर लगे एक कलंक को, जो लगाया इसी की माटी पर खेलने-कूदनेवाले तीन युवकों ने। लंदन में तीन भूमिगत ट्रेनों और एक बस में धमाका कर मौत का तांडव रचनेवाले चार आत्मघाती हमलावरों में से तीन लीड्स के रहनेवाले थे।
लीड्स पहुँचकर पाया कि साल भर पहले लीड्स का जो मानमर्दन हुआ उसकी चोट गहरी पड़ी है। मुसलमान ही नहीं हिंदू भी परेशान हैं।
“हमने महसूस किया है कि अब यहाँ के लोग हमें ‘दूसरी’ निगाह से देखते हैं, उनके लिए तो हिंदू-मुसलमान-हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी एक ही जैसे हैं” – ये वाक्य ना जाने कितने ही लोगों को कहते पाया।
अब ये जो टिप्पणी थी,स्वयं को लाचार-बेचारा साबित करने की, वो एक क्षण के लिए स्वाभाविक लगी, कि ख़ामख़्वाह शरीफ़ लोग तंग हो रहे हैं। लेकिन जिस अंदाज़ में ये टिप्पणियाँ की जा रही थीं, उनमें एक ऐसी बात निहित थी जो इन तंग होने का दावा करते लोगों से ज़्यादा तंग करनेवाली थी। जो भी इस वाक्य का इस्तेमाल कर रहा था - कि हमारे साथ भेदभाव हो रहा है - वो बिना मुँह खोले ये प्रमाणित करना चाहता था कि वो मुसलमान नहीं है, पाकिस्तानी नहीं है, शरीफ़ है,शांतिप्रिय है। यानी - वो हिंदू है, भारतीय है।
और इसके साथ ही एक सवाल आ खड़ा हुआ - कि यदि चंद अपराधियों के कारण, कोई किसी को ‘दूसरी’ निगाह से देखता है तो इससे तो उनको भी परेशानी होनी चाहिए ना जो मुसलमान भी हैं, पाकिस्तानी भी हैं, शरीफ़ भी हैं, और शांतिप्रिय भी। वो क्या करें? भेदभाव क्या उनके साथ नहीं हो रहा?
और चलिए मान भी लिया कि ‘निगाह’ दूसरी है, तो? खोट 'दूसरी' निगाह से देखनेवाले में भी तो हो सकता है? हो सकता है, वो असहिष्णु हो, अज्ञानी हो, मूढ़ हो? और एक-दो ने 'दूसरी' निगाह से देख भी लिया तो क्या उसे सारे समाज की 'दूसरी' निगाह मान लेना ज़्यादती नहीं होगी?
मुझे लगा कि मासूम दिखने की चेष्टा करनेवाले ऐसे चतुर सज्जनों से कहूँ - कि आप ये जो स्वयं को मासूम, बल्कि दूसरों की अपेक्षा श्रेष्ठ साबित करने का उपक्रम कर रहे हैं,उसमें इस बात का पूरा ख़तरा है कि कहीं विरासत में मिले संस्कारों का ही अंतिम संस्कार ना कर बैठें।
मुझे लगा कि उन्हें झकझोरते हुए बोलूँ - कि अगर ऐसी स्थिति आन पड़े कि वाल्मीकि-वशिष्ठ जैसे मुनि-महर्षियों से लेकर स्वामी विवेकानंद-गांधी जैसे महापुरूषों के वचनों और कर्मो से सजाई और संवारी गई संस्कृति की श्रेष्ठता साबित करने का प्रयास करना पड़े, तो खेद के साथ कहना पड़ता है कि सोच में कहीं खोट है।
मुझे लगा कि उनकी आँखों में आँख डालकर बताउँ - कि श्रेष्ठ पुरूषों को श्रेष्ठ आचरण भी करना पड़ता है। और श्रेष्ठता कैसी हो? स्वामी विवेकानंद की बताई उस सीख के जैसी – सदैव कहो अपने-आप से कि तुम श्रेष्ठ हो, मगर, दूसरे को हीन समझे बिना।
पर सारी बातें मन में रह गईं, लंदन लौटना था, भूख भी लग गई थी, रास्ते में एक पब दिखा, पब की असल छवि तो मदिरालय की है, लेकिन मुझे पब का खाना बड़ा अच्छा लगता है जो जेब और स्वाद दोनों के अनुकूल होता है। तो पब में घुसा, देखा हर किसी के हाथ में जाम है - क्या गोरा-क्या काला, क्या हिंदू-क्या मुसलमान। बरबस मधुशाला की एक पंक्ति याद आई -
“मुसलमान और हिन्दू हैं वो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला;
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद-मंदिर में जाते;
बैर बढ़ाते मस्जिद-मंदिर, मेल कराती मधुशाला.”
Thursday, 25 September 2008
अर्धसत्य के चप्पू चलाते हिंदू-मुसलमान
पर क्या ये अजीब बात नहीं क्योंकि अर्धसत्य का क़द तो झूठ से भी बड़ा दिखाई देता है, अर्धसत्य को असत्य कहकर ख़ारिज़ नहीं किया जा सकता, उसका अस्तित्व मिटाया नहीं जा सकता, वो जब चाहे तब, अपनी सुविधा से ढिठाई से खड़ा हो जाता है, सबको चिढ़ाता है।
अब देखिए ना, बम फटे नहीं, चर्चों पर हमले हुए नहीं कि सबने अर्धसत्य के चप्पू थामकर अपनी नैया चलानी शुरू कर दी, चाहे हिंदू हों चाहे मुसलमान।
मुसलमान कहे फिर रहे हैं -"साहब अंधेरगर्दी की इंतिहाँ है, हमारी क़ौम से जिसे चाहे उसे पकड़ ले रहे हैं, बेचारे पढ़ाई करनेवाले लड़के हैं, अँग्रेज़ी भी बोलते हैं, और ना कोई सबूत है ना सुनवाई, लैपटॉप-एके 47 - ये सब तो पुलिस जहाँ चाहें वहाँ डाल दे, जिन बेचारों को पकड़ा, उन्हें तो धकियाकर जो चाहे उगलवा लो। और मुठभेड़ के बारे में किसे नहीं पता है - वो तो बस फ़र्जी होते हैं, कश्मीर में हो चाहे दिल्ली में।"
और जो पुलिसवाला मारा गया?
"वो तो साहब कुछ इंटरनल राइवलरी होगी, पिछले दिनों एक और नहीं मारा गया था इसी तरह, नहीं तो आप बताइए कि इतना अनुभवी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट - बिना बुलेटप्रूफ़ के चला गया!"
"और साहब बम तो हिंदू भी फोड़ रहे हैं, बदनाम केवल हमें किया जाता है। आप ही सोचिए, मालेगाँव और हैदराबाद में मस्जिद के भीतर भला कोई मुसलमान बम फोड़ेगा?"
संदेह निराधार नहीं है, उसमें हो सकता है सच्चाई भी हो - लेकिन - हो सकता है कि नहीं भी हो।
हो सकता है कि मुठभेड़ फ़र्जी ना हो, हो सकता है कि लड़के बेक़सूर ना हों, हो सकता है कि आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त अधिकतर लड़के मुसलमान हों, हो सकता है कि मस्जिदों में बम वही का़तिल फोड़ रहे हैं जो पाकिस्तान से लेकर बसरा तक की मस्जिदों में फोड़ा करते हैं, और हो सकता है कि पढ़ने-लिखने के बावजूद कुछ लोगों का दिमाग़ वैसे ही अपराध के लिए प्रेरित होता है जैसे डॉक्टर ऐमन अल ज़वाहिरी का हुआ है या पायलट की अतिकठिन पढ़ाई करने के बाद विमानों को ट्रेड टावर से टकरानेवाले युवाओं का हुआ होगा।
ऐसे में ऐसे संदेहों को क्या समझा जाए? सत्य? असत्य? या - अर्धसत्य?
अब ज़रा हिंदुओं की सुनिए - "चर्च पर हमला ग़लत है, हिंसा ग़लत है, लेकिन उसकी शुरूआत कहाँ से हुई? स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को मारा तो उनके भक्त ग़ुस्सा नहीं होंगे? और ये जो क्रिश्चन-त्रिश्चन कर रहे हैं या मुस्लिम-तुस्लिम, आज से पाँच-छह सौ साल पहले ये लोग क्या थे? पैसे और तलवार के दम पर हुआ सारा धर्म परिवर्तन।"
यहाँ भी सवालों में सच्चाई हो सकती है - मगर किसी की हत्या पर ग़ुस्सा होना सामान्य बात है तो फिर कश्मीर-पूर्वोत्तर भारत-नक्सली भारत या फिर कहीं भी, किसी के भी - चाहे आतिफ़ हो चाहे असलम - उनके मारे जाने पर भी उनके क़रीबी लोगों का ग़ुस्साना स्वाभाविक नहीं होना चाहिए? और रहा प्रलोभन और ताक़त के दम पर होनेवाले धर्म परिवर्तन का, तो वो भी सच हो सकता है, लेकिन क्या ये सच नहीं कि धर्म बदलनेवाले अधिकतर हिंदू ऐसे थे जिन्हें हिंदू समाज में सिवा हिकारत के कुछ नहीं मिला।
ऐसे में हिंदुओं ने जो सवाल उठाए उन्हें क्या समझा जाए? सत्य? असत्य? या - अर्धसत्य?
Wednesday, 3 September 2008
आधे घंटे की धूप, पूरे जीवन की सीख
कुछ समझ पाते इससे पहले ही एक मास्टर साहब आए और लड़कों से हड़बड़ाते हुए कहा - चलो, सबलोग मैदान में जाकर खड़े हो जाओ जहाँ प्रार्थना होती है, फिर शिक्षक महोदय दूसरी कक्षा की ओर बढ़ गए।
लड़कों को कुछ भी पल्ले ना पड़ा लेकिन मास्टर साहब का आदेश था, वो भी आए दिन छात्रों की पीठ पर मुक्केबाज़ी का अभ्यास करनेवाले मास्टर साहब का आदेश था, लड़के बिना कोई दुस्साहस दिखाए मैदान की ओर बढ़ चले।
ज़िला स्कूल अँग्रेज़ों के ज़माने का बना था, पुरानी अँग्रेज़ी शैली की शानदार इमारत, छात्रावास, प्रिंसिपल और वाइस प्रिंसिपल का बंगला, और तीन-तीन मैदान - मुज़फ़्फ़रपुर के ज़िला स्कूल का परिसर विशाल था, कक्षा से सभास्थल तक आने में कुछ समय लगता था।
हाईस्कूल में केवल तीन ही कक्षाएँ थीं, लाइन लगाने की एक व्यवस्था थी, पहले आठवीं की लाइन, फिर नवीं और तब दसवीं के लड़कों की लाइन - हर कक्षा में पाँच सेक्शन थे - एक सेक्शन में चालीस छात्र। थोड़ी ही देर में अलग-अलग कद काठी मगर एक ही तरह के कपड़ों - सफ़ेद शर्ट और नीली पैंट पहने छह सौ छात्र मैदान में खड़े हो गए।
लड़कों में ख़ुसुर-फ़ुसुर जारी थी, लेकिन किसी को कोई अंदाज़ा नहीं था कि इस अप्रत्याशित तरीक़े से घंटी क्यों बजी और वे मैदान में बे-समय क्यों जमा हैं। सभास्थल पर एक मंच था, कोई दो-तीन फ़ीट ऊँचा, प्रार्थना के समय वहाँ प्रिंसिपल-अध्यापक खड़े रहते थे, मगर अभी वहाँ सन्नाटा छाया था, बस सामने लड़के खड़े थे।
महीना गर्मियों का था, जुलाई-अगस्त का कोई दिन, दोपहर के तीन बज रहे होंगे, सूर्यदेवता अपना पराक्रम दिखा रहे थे।
सुबह ही बारिश हुई थी, हवा में बिखरे धूलकण फ़ुहारों में धुल चुके थे, आसमान नए शीशे की तरह साफ़ हो चुका था, अदने लड़कों पर धूप मोटी बौछार की तरह बरस रही थी।
पाँच-दस मिनट तक तो लड़के खुसुर-फ़ुसुर में व्यस्त रहे, मगर इसके बाद धूप उन्हें अखरने लगी, पहले वे परेशान हुए, फिर पस्त और आख़िरकार त्राहि-त्राहि की अवस्था आ गई - आधे घंटे के बाद।
मगर लड़के अनुशासन से आतंकित थे, उन्हें पीठ पर थुलथुल मास्टर महोदय के मुक्कों की बरसात, सूर्यदेवता के कोप से अधिक भयावह लगी, वे लाइन में खड़े ही रहे।
आख़िरकार स्कूल का भवन, ख़ाली मंच, ख़ुला मैदान, किनारे खड़े पेड़, शीशे की तरफ़ साफ़ आसमान, पराक्रमी सूर्यदेवता और बेदम होते लड़के - इन सारे किरदारों के बीच एक और किरदार का पदार्पण हुआ, लड़कों में सुगबुगाहट हुई।
लड़कों ने देखा, श्वेत धोती-कुर्ते में लिपटी एक भीमकाय काया, थुलथुलाती हुई, तालमय गति से, स्कूल के भवन की ओर से उनकी ओर बढ़ी आ रही है।
लड़के क्रोधित भी थे और भयभीत भी। क्रोधित इस बात पर कि ये वही सज्जन थे जिन्होंने उनको यूँ आधे घंटे से उनको मैदान में खड़ा करवा रखा था, बिना कोई कारण बताए। और भयभीत इस बात पर कि ये वही सज्जन थे जिनके मुक्कों की बरसात प्रसिद्ध थी। भय क्रोध पर भारी रहा - लड़के यथावत् खड़े रहे।
थुलथुल काया लड़कों के पास पहुँची, चार सीढ़ियों पर उठी और फिर मंच पर खड़ी हो गई, लड़कों को निहारने लगी, चेहरे पर कोई भाव नहीं - ना ग्लानि, ना क्रोध।
अंततः उदगार फूटे - "तुम सब सोच रहे होगे कि यहाँ ऐसे तुमलोगों को क्यों खड़ा कर दिया गया है, धूप लग रही होगी, पसीना बह रहा होगा, गला सूख रहा होगा, साँस फूल रही होगी, पैर थक रहे होंगे, शरीर बेदम हो रहा होगा, अपनी असहाय अवस्था पर कभी क्रोध आ रहा होगा, कभी निराशा हो रही होगी - है ना?"
लड़के यथावत् खड़े थे, मगर मास्टर साहब की प्रभावशाली भाषा और स्पष्ट वाणी उनके कानों में सीधे उतर रही थी।
कुछ पल के मौन के बाद उदगार फिर फूटे - "अब ज़रा सोचो कि आज लाखों लोग , इस धूप में, खुले आसमान के तले, किसी छत पर, किसी छप्पड़ पर, किसी मैदान में, किसी रेलवे लाइन पर, किसी ज़मीन के टुकड़े पर, कई दिनों से भूखे-प्यासे पड़े हैं, वो कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उनके चारों ओर जलसागर है - बाढ़ में फँसे उन लाखों लोगों को कैसा लग रहा होगा?"
कुछ पल मौन रहा।
मंच से आवाज़ आई- "मैंने तुम सबको इसी कष्ट की अनुभूति कराने के लिए पिछले आधे घंटे से धूप में खड़ा रखा।"
कुछ पल फिर मौन रहा।
मंच से फिर आवाज़ आई - "अब कल तुमलोग बाढ़ प्रभावितों के लिए अपने-अपने घर से जो भी हो सकता है, खाना-पीना-पैसा-कपड़ा, लेकर आना, हम स्कूल की तरफ़ से बाढ़ में फँसे लोगों की सहायता की मदद में हाथ बँटाना चाहते हैं। अब तुमलोग क्लास में चले जाओ।"
लड़के स्तब्ध थे, जो बाढ़ आज सुबह तक उनके लिए एक शब्द था, एक समाचार भर था, - बाढ़ होती क्या होगी, इसे उन्होंने महसूस किया, जीवन में पहली बार, वो भी भयावह कष्टों का केवल एक हिस्सा भर, केवल आधे घंटे के लिए।
ज़िला स्कूल, मुज़फ़्फ़रपुर में हिंदी पढ़ानेवाले थुलथुल मास्टर साहब - राजेश्वर झा - की आधे घंटे की वो सीख उनके उन सभी मुक्कों से अधिक असरदार साबित हुई जिन्हें वे यदा-कदा अपने छात्रों की पीठ पर बरसाते रहते थे।
बिहार में आई भयानक बाढ़ के समय फिर वो आधे घंटे की धूप याद आ रही है।
Saturday, 23 August 2008
अभिनव बिन्द्रा - एक समझदार अमीर?
"पता नहीं क्या समझता है अपने-आपको" - अभिनव बिन्द्रा के बारे में मेरी ये राय छह साल तक रही, अब उस राय पर मुझे संदेह हो रहा है। मगर इसलिए नहीं कि उसने देश का नाम रोशन किया, तिरंगे की लाज रखी, राष्ट्रगान बजवाया, और तथाकथित रूप से एक अरब से भी अधिक लोगों का मस्तक ऊँचा करवाया।
मुझे अपनी राय पर संदेह किन्हीं और कारणों से हो रहा है, ठीक उन्हीं कारणों से, जो अभिनव बिन्द्रा के ख़िलाफ़ जाते हैं।
जो सबसे बड़ी बात अभिनव बिन्द्रा के ख़िलाफ़ जाती है, वो ये, कि वो एक अत्यंत ही अमीर घर का लाड़ला है, उसने मेडल जीत ही लिया तो क्या? और जीता भी तो ऐसे खेल में जो, बकौल श्रद्धेय अफ़लातून जी के, राजा टाइप लोगों का खेल है।
मैं भी ऐसी ही राय रख रहा था, बहुतों ने तो ओलंपिक में अभिनव की जीत के बाद पत्र-पत्रिकाओं-टीवी पर उसकी पृष्ठभूमि पढ़ने-देखने के बाद अभिनव के बारे में एक नकारात्मक राय बनाई होगी, मैं तो छह साल से बनाए हुए था। मगर पता नहीं कब, अनायास कुछ सवालों ने आ घेरा -
कि अभिनव अगर अमीरज़ादा है तो क्या एक अरब वाले देश में वो अकेला अमीरज़ादा है?
कि अभिनव अगर राजा साहब टाइप है, तो क्या वो ऐसा अकेला राजा साहब टाइप है, बनारस से लेकर बलिया तक में ऐसे राजा साहब नहीं होते?
कि अभिनव की निशानेबाज़ी अगर रईसी का उदाहरण है, तो उसकी निशानेबाज़ी और सलमान-सैफ़-पटौदी साहब की निशानेबाज़ी में क्या कोई अंतर नहीं?
कि अभिनव के पिता यदि ये कहते हैं कि वो बचपन में नौकरानी के सिर पर गुब्बारे फोड़ता था, तो क्या अपनी औलाद के बारे में ऐसी डींग मारनेवाले उसके पिता ऐसे अकेले पिता हैं, टीवी पर गाना गानेवाले अपने नकलची बच्चों को देख सुबकते माता-पिता को क्या कहिएगा, अकेले बिन्द्रा साहब को धृतराष्ट्र की पदवी क्यों? फिर घर में नौकरों को उनकी हैसियत समझानेवाले बिन्द्रा साहब क्या ऐसे अकेले साहब हैं?
कि अभिनव को अगर अपने घर के कुत्तों की याद आती है, तो क्या श्वानों के प्रति ऐसा वात्सल्य रखनेवाला अभिनव अकेला व्यक्ति है?
कि अभिनव ने अगर विदेश में रहकर पैसे फूँककर ट्रेनिंग की, तो पैसे के बल पर विदेशों में रहकर शिक्षण-प्रशिक्षण करनेवाला क्या वो अकेला व्यक्ति है?
कि अभिनव ने अगर इंटरव्यू देते समय अकड़ दिखाई तो क्या ऐसी अकड़ दिखानेवाला वो अकेला सेलिब्रिटी है? सेलिब्रिटी तो दूर, ज़रा अपने इलाक़े के कलक्टर-डीएम-डीसी से ही बात करके देख लीजिए, अकड़ का अर्थ समझ में आ जाएगा।
ऐसे अमीर, ऐसे राजा साहब, ऐसे श्वानप्रेमी, ऐसे विदेशपठित-विदेशप्रशिक्षित लोग एक-दो नहीं हज़ारों और लाखों होंगे भारत में। लेकिन अभिनव बिंद्रा की गिनती उस भीड़ से अलग करनी होगी। अभिनव उन चंद लोगों में गिना जाना चाहिए जिसने अपनी संपन्नता को एक अर्थ दिया है। वो भारत का पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक विजेता है - ये बात इतिहास में दर्ज हो चुकी है, इतिहास ये नहीं देखता कि नायकों की पृष्ठभूमि क्या होती है, इतिहास देखता है, उसकी उपलब्धि को।
अभिनव की उपलब्धि पर छींटाकशी करना थोड़ी ज़्यादती लगती है, उसमें ख़ामियाँ हैं, ये सत्य है, लेकिन इस आधार पर उसे ख़ारिज़ कर देना एक दूसरे सत्य से मुँह चुराने के जैसा है। अभिनव के बहाने फिर वही टकराव का मनहूस रास्ता सामने खड़ा है जो पता नहीं किसी मंज़िल पर जाता भी है या नहीं? इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं कि दिल्ली और देहात की लड़ाई अभिनव के मेडल जीतने के बाद भी उसी जगह है, जिस जगह उसके मेडल जीतने से पहले थी, ऐसे में एक व्यवस्था पर चोट ना कर, किसी एक को निशाना बनाना, वो भी उसपर जिसने कुछ तो किया, ये थोड़ी छोटे दिल वाली सोच लगती है।
ये सवाल हमेशा खड़ा मिलता है - उपलब्धि किसकी बड़ी होनी चाहिए - उसकी, जिसके पास कुछ भी नहीं, या उसकी, जिसने बहुत कुछ छोड़ा।
जिनके पास कुछ नहीं, उनकी उपलब्धि की प्रेरणादायी कहानियों से हम हमेशा दो-चार होते हैं,अपनी हिम्मत-मेहनत-लगन से तकदीर बदलनेवालों की ऐसी कहानियाँ जीवन-पुरूषार्थ-कर्म के प्रति आमजनों के विश्वास को जीवित रखती हैं। मगर ग़ौर से देखा जाए तो कुछ हासिल करने के लिए- जिनके पास सबकुछ है - शायद उनको भी उतना ही संघर्ष करना पड़ता है जितना जिनके पास नहीं है उनको।
अभिनव अमीर है, स्मार्ट है, अंग्रेज़ीदां है, सेलिब्रिटी भी है - भौतिक सुखदायी ऐसे कौन से साधन हैं जो उसकी पहुँच से बाहर रहे होंगे? लेकिन उसने अपने आप पर नियंत्रण किया होगा, बहुत सारे प्रलोभनों पर विजय पाई होगी, अपनी संपन्नता को एक मक़सद दिया होगा, और तब जाकर उसने हासिल की, एक ऐसी उपलब्धि, जिसपर घरवाले जो कहना है कहें, बीजिंग में जुटे बाहरवाले एक उपलब्धि की निगाह से देखते हैं।
यदि मात्र संपन्नता से ही सबकुछ जुटाया जा सकता तो क्या आज धन्नासेठों की अट्टालिकाएँ स्वर्ण पदकों से नहीं चमचमा रही होती? अभिनव की उपलब्धि शायद गाँव-देहात में सिमटे लोगों के लिए कोई मायने नहीं रखती होगी, लेकिन आज के आधुनिक भारत का भार कंधे पर टाँगे टहल रहे युवाओं के लिए एक आदर्श बेशक बन सकती है।
सोचिए कि अगर दो-चार प्रतिशत धन्नासेठ भी अभिनव बिन्द्रा की ही तरह अपनी धन-दौलत ऐसी किसी किसी चीज़ में लगा दें, जिससे कि भारत को मेडल मिलता हो, तो उससे मेडल ही आएगा ना, वो मोटर-मोहिनी-मदिरा में तो ज़ाया नहीं होगा। और ऐसी कल्पना तो दिवास्वप्न ही होगी कि राजा टाइप लोग स्वयं ही, बेबात रंक सरीखों में अपना ऐश्वर्य लुटा देंगे।
मैं इसलिए अपनी राय कि - "पता नहीं क्या समझता है अपने-आपको" - इस राय को बदलता हूँ। अब मुझे लगता है कि - "शायद समझता है वो अपने-आपको"।
शायद समझता हो वो सेनेका की इस उक्ति का सार - "Wealth is the slave of a wise man. The master of a fool."
Thursday, 21 August 2008
अभिनव बिन्द्राः एक अक्खड़ अमीर?
और अभिनव बिन्द्रा के बारे में मेरी ये राय छह साल तक बनी रही।
बात है मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स की - जहाँ भारत ने तहलका ही मचा दिया था - 32 स्वर्ण, 21 रजत, 19 कांस्य! सबसे कमाल का प्रदर्शन था निशानेबाज़ों का - 14 स्वर्ण, 7 रजत, 3 कांस्य!
पूरा भारत आनंदित था,कि भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स में सिक्का जमा दिया; बिस्ली में जमा सारी भारतीय शूटिंग टीम उत्साहित थी,कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी उपस्थिति का अहसास करा दिया;वहाँ मौजूद सारे भारतीय पत्रकार संतुष्ट थे,कि उनका आना सार्थक रहा।
लेकिन केवल एक शख़्स ऐसा था जो ना आनंदित था, ना उत्साहित और ना संतुष्ट - अभिनव बिन्द्रा।
अंजलि वेद भागवत,राज्यवर्धन राठौड़,जसपाल राणा,समरेश जंग,सुमा शिरूर - सबने ख़ुशी-ख़ुशी बात की। एक सिवा अभिनव के।
इंटरव्यू के लिए गया तो उसने कहा - जो पूछना है जल्दी पूछो, मुझे नहाने जाना है। बेबात की हड़बड़ी का माहौल बनाया उसने, और फिर ऐसे जल्दी-जल्दी बात की, मानो उसका कुछ छूटा जा रहा है। और बोला भी तो क्या बोला - कॉमनवेल्थ में मेडल मिलना कोई बड़ी बात नहीं है, यहाँ तो मुक़ाबला आसान रहता है!
लेकिन इसके बाद देखता हूँ - अगले सात-आठ घंटे तक वो वहीं आस-पास टहल रहा है। मैंने क्रुद्ध निगाहों से घूरा - क्या हुआ,नहाने जानेवाले थे ना? मगर उसकी निगाह कहीं और थी, वो परेशान था।
उसे बांग्लादेश के एक 15 साल के लड़के ने हरा दिया था - आसिफ़ हुसैन ख़ान। बिल्कुल ही मोहल्ले का लोकल लड़का लग रहा था आसिफ़, कम-से-कम वेल-ड्रेस्ड अभिनव के सामने, अभिनव को अपनी हार पच नहीं रही थी, वो उस लड़के से सवाल पूछे जा रहा था, उसकी निगाहों से लगा जैसे उसे आसिफ़ पर संदेह है, कम-से-कम उसकी उम्र पर, वो किसी भी सूरत में 15 वर्षीय किशोर नहीं लग रहा था, तब अभिनव 19 का रहा होगा।
बहरहाल मैं बिस्ली से लंदन लौटा, यही राय मन में बनाए कि - "पता नहीं क्या समझता है अपने आपको"।
ये राय ग़लत नहीं है, इसका विश्वास ओलंपिक शुरू होने से पहले भी तब हुआ जब एक सहयोगी को, जो ओलंपिक पर विशेष सामग्रियाँ जुटा रहा था, ये कहते हुए सुना - सबसे बात हो गई है, राठौड़, अंजलि, समरेश - एक बिंद्रा ही बात नहीं कर रहा।
मगर पिछले सप्ताह जब सुबह-सुबह अभिनव की जीत की ख़बर देखी, तो एकबारगी अपनी राय पर संदेह होने लगा। ये संदेह फिर दफ़्तर जाते ही दूर भी हो गया, जब सबको बोलते सुना - यार पूरा देश नाच रहा है, लोग रो रहे हैं, एक बस अकड़ के बैठा हुआ है तो अभिनव बिन्द्रा।
वो तो किसी से बात कर नहीं रहा था, उसकी माँ मिलीं तो बोलीं - उसने फ़ोन किया था और जब मैंने कहा कि हम मीडिया से बात कर रहे हैं, तो उसने कहा - आर यू क्रेज़ी! फिर उसने अपने दोनों कु्त्तों का हाल पूछा और कहा कि बाद में बात करेगा! पिता से बात की तो वो बोले - दो हज़ार बोतलें मँगवा ली हैं, शैम्पेनें हैं, व्हिस्कियाँ हैं, आओ-पीओ-ऐश करो!
फिर पता चला - उसने घर में शूटिंग रेंज बनाया हुआ है, तीन महीने से विदेश में है, एक कंपनी का सीईओ है, दून और सेंट स्टीफ़ेंस से पढ़ा है।
बस - इतना काफ़ी था। सारे सहयोगियों के चेहरे तमतमा उठे। मेरी राय - कि पता नहीं अपने-आपको क्या समझता है - इसमें एक और राय जुड़ गई - पैसेवाला बिगड़ैल है, अमीर बाप का बेटा।
मुझे राहत मिली - चलो मेरी राय शर्मिंदा होने से बच गई।
फिर उसके बाद इधर-उधर काफ़ी कुछ मिला पढ़ने को जिनका सार यही था - अभिनव घमंडी नहीं, एकांतप्रिय है। वैसे अपने समाज में नायकों के पूजन की परंपरा रही है, तो इसलिए अब पारखी जन अभिनव बिन्द्रा के गुणों को तलाशने और तराशने में जुट जाएँगे - इसमें कोई अचरज की बात नहीं।
मगर अब मैं अपनी राय बदल रहा हूँ। अब मुझे लग रहा है - "शायद समझता है वो अपने-आपको"।
क्यों बदल रहा हूँ मैं अपनी राय - ये अगले लेख में।
Tuesday, 5 August 2008
फिर आना मम्मी
ठीक पंद्रह साल पहले नियति ने एक पगडंडी पर ला खड़ा किया था, जो घर से बाहर जाती थी। फिर तो घर से बाहर का रास्ता दिखानेवाली उस पगडंडी से न जाने कितनी बार गुज़रता रहा - बनारस-घर, दिल्ली-घर, गोहाटी-घर, कलकत्ता-घर, लंदन-घर...
हर बार उस पगडंडी के एक तरफ़ घर होता था, मम्मी होती थी, और दूसरी तरफ़ मैं होता था। कभी आता हुआ, कभी जाता हुआ।
आता तो मम्मी का खु़श चेहरा दिखाई देता, जाता तो हाथ हिलाती मम्मी खड़ी रहती। पहले ऑटो से हाथ हिलाया करता, फिर स्लीपर बोगी की खिड़की से, फिर एसी कम्पार्टमेंट के दरवाज़े पर खड़े होकर, और अब एयरपोर्ट के डिपार्चर लाउंज पर।
पंद्रह सालों से चला आ रहा ये सिलसिला अब तो एक आदत के जैसा लगने लगा था, साल-दर-साल छुट्टियों में घर जाना, मुस्कुराती मम्मी का घर के दरवाज़े पर खड़ा मिलना, कुछ हफ़्ते या फिर महीना भर घर पर रहना, फिर वापसी, मुस्कुराती मम्मी, हाथ हिलाते हुए विदा करती मम्मी।
लेकिन आज - कुछ अलग हुआ, आज मम्मी गई, और एयरपोर्ट के डिपार्चर लाउंज के बाहर खड़ा मैं हाथ हिलाता रहा।
महीने भर पहले भी ऐसा ही कुछ अलग हुआ था, एयरपोर्ट से बाहर मैं नहीं निकला, मम्मी निकली थी, मैं बाहर खड़ा था।
पिछले एक महीने से मम्मी साथ थी, पंद्रह साल में पहली बार ऐसा हुआ जब इतना लंबा अर्सा मम्मी के साथ बिताया, मम्मी को उस रूप से दूसरे रूप में देखा, जिसमें बचपन से आज तक देखता रहा था, इस बार वो हम भाई बहनों के खाने-पीने के इंतज़ाम में घिरी मम्मी नहीं थी, ना वो पूरे घर की सफ़ाई में भिड़ी हुई मम्मी थी, ना ही मोहल्ले में लडुआ की दूकान से बिस्कुट-साबुन-सर्फ़ या कॉलोनी की सब्ज़ी की दूकान से आलू-प्याज़-परबल लेकर घर लौटती हुई मम्मी थी।
इस बार मम्मी लंदन में थी, हमारे घर थी, वो हमारे साथ सुपरस्टोर में ख़रीदारी कर रही थी, मैक्डोनल्ड्स में आलू के चिप्स और वेजिटेबल पैटीज़ खा रही थी, मैडम तुसॉद्स में नक़ली शाहरूख़-सलमान तो नेहरू सेंटर में असली ओम पुरी-गिरीश कर्नाड के साथ फ़ोटो खिंचा रही थी, केम्बिज युनिवर्सिटी में नेहरू जी और मनमोहन सिंह का कॉलेज देख रही थी, और जिसने आज तक ना कोई समुंदर देखा, ना पहाड़, वो मम्मी सात समुंदर पार एडिनबरा में समुंदर किनारे टहल रही थी, स्कॉटलैंड के ख़ूबसूरत पहाड़ों के तले खड़ी थी!
लंदन की टूरिस्ट मम्मी, घर की गार्जियन मम्मी से बिल्कुल अलग थी। लंदन की मम्मी का चेहरा उत्साह से दमक रहा था, उसके पाँव समुंदर की लहरों से मिलकर थिरक रहे थे, उसके बढ़-चढ़कर फ़ोटो खिंचवाए जा रही थी। मम्मी उन सब जगहों पर हमारे साथ थी, जिन जगहों पर इससे पहले केवल मैं और मेरी पत्नी या कभी-कभार बाहर से आए कुछ दूसरे रिश्तेदार या दोस्त जाया करते थे।
मम्मी आज चली गई, पत्नी एयरपोर्ट से ही दफ़्तर निकल गई, मैंने छुट्टी ली है, तो मैं घर लौटा हूँ, घर पर आज महीने भर बाद ख़ुद चाभी से दरवाज़ा खोलना पड़ा, महीने भर से कॉल बेल बजाया करता और मम्मी दरवाज़े पर खड़ी मिलती।
वैसे अपनी चाभी से अपने कमरों के दरवाज़े खोलने का ये सिलसिला कोई नई बात नहीं, पहले होस्टल का कमरा होता था, फिर जहाँ-जहाँ रहा वहाँ के कमरे। पंद्रह सालों से ऐसा ही चल रहा है।
लेकिन पंद्रह सालों में आज पहली बार कुछ अलग-सा महसूस हो रहा है। पहली बार ये समझ पा रहा हूँ कि कि कैसा लगा करता रहा होगा मम्मी को - पिछले उन पंद्रह वर्षों से, जब वो हाथ हिलाती पहले बेटे को, और फिर बाद में बेटे-बहू को विदा करती होगी और वापस उन दीवारों की ओर लौटती होगी, जिसके हर कोने में-हर क़तरे में कुछ देर पहले तक कोई और भी बसा हुआ था।
मैं तो बस घंटे-डेढ़ घंटे में फ़ोन लगाकर मम्मी से बात कर स्वयँ को आश्वस्त भी कर लूँगा कि मम्मी की यात्रा कैसी रही, लेकिन आज ये कल्पना ही विचित्र लगती है कि कैसा लगता रहा होगा मम्मी को उन दिनों जब ना फ़ोन था ना मोबाईल, बस चिट्ठियाँ ही बताया करतीं ये हाल कि ट्रेन कितने घंटे देर से पहुँची और रास्ते में क्या-क्या हुआ।
आज लंदन के इस ख़ाली घर में घर से बाहर निकलनेवाली पिछले पंद्रह सालों की वे सारी यात्राएँ याद आ रही हैं। लंदन का ये ख़ाली घर आज कह रहा है - फिर आना मम्मी, ज़रूर आना, तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लग रहा।
Wednesday, 12 March 2008
हॉकी का हाहाकार और हुआँ-हुआँ
मगर बोलेंगे तो कौन सी नई बात बोलेंगे? करिश्माई क्रिकेट और हताश हॉकी के बीच का भेद-भाव? खेल बनाम राजनीतिक दखलंदाज़ी? यही सब बातें उठेंगी ना? और फिर डिक्शनरी के उन्हीं घिसे-पिटे शब्दों में कसमसाती बहस बेनतीजा दम तोड़ देगी। इसका इतर किसी परिणाम की आशा जिन्हें हो, उनकी आशावादिता को शत्-शत् प्रणाम।
लेकिन ये भी है कि बहस से बचना, पलायन करने के समान है। और जब अमर्त्य सेन ने हम भारतीयों को - द आर्ग्युमेन्टेटिव इंडियन - की संज्ञा दे ही दी है, तो आर्ग्युमेन्ट किए बिना जान कैसे छूटेगी? अब ये अलग बात है कि जो हुआँ-हुआँ मची है, उसमें सारी हुआँओं का राग एक ही सुनाई दे रहा है - राग क्रंदन।
हुआँकारों से बस एक ही सवाल है - जो हुआ उसका अंदेशा क्या पहले से नहीं था?
एक समय था जब हॉकी टीम के सितारों - ज़फ़र इक़बाल, मोहम्मद शाहिद, थोएबा सिंह, विनीत कुमार, परगट सिंह, एम पी सिंह, सोमैय्या जैसे नाम, सुनील गावस्कर, कपिल देव, रवि शास्त्री, किरमानी, श्रीकांत, अज़हरूद्दीन जैसे नामों की ही तरह युवाओं में लोकप्रिय हों ना हों, अनसुने बिल्कुल नहीं होते थे।
जिस भक्तिभावना से क्रिकेट की कमेंट्री सुनी जाती थी, उसी आस्था से विश्व कप, ओलंपिक, चैंपियंस ट्रॉफ़ी जैसे हॉकी टूर्नमेंटों में भारत के मैचों के समय भी खेल प्रेमी, फ़िलिप्स-बुश-संतोष के ट्रांजिस्टरों से कान लगाए बैठे रहते थे।
आज - गुस्ताख़ी माफ़ हो, मगर बेशर्मी से लिख रहा हूँ कि एक प्रोफ़ेशनल मीडियामानव होने के बावजूद, मुझे स्वयं नहीं पता कि भारतीय टीम का कप्तान कौन है? धनराज पिल्लई के बाद दिलीप तिर्की के नाम तक याद है, लेकिन फिर हॉकी से मेरा वास्ता बस किसी मैच की कहानी बताने भर से रह गया है।
अभी भी जब हॉकी की बहस चल रही है, तो कारवाल्हो ने इस्तीफ़ा दिया-गिल ने नहीं दिया, इससे अधिक मुझे कुछ नहीं पता कि कौन कप्तान है, कि किसने कितने गोल मारे, और कि किसने कितने बचाए?
और ऐसे में हॉकी पर शर्म करने के बजाय, मुझे अपने आप पर शर्म आ रही है। लेकिन छिछले राष्ट्रवाद और झूठे आत्मगौरव के दौर में मैं भी हुआँ-हुआँ करने के लोभ का संवरण नहीं कर पा रहा।
पर आज इस हुआँ-हुआँ में अपनी हुआँ मिलाने के साथ-साथ, मैं अपने आप को इन सवालों से जूझता पा रहा हूँ - भारतीय हॉकी के अंतिम सुपरस्टार धनराज पिल्लई की जब बेमौक़े मूक विदाई हो गई - तब क्यों नहीं की हुआँ-हुआँ? जब साल भर पहले ओलंपियन विनीत कुमार ने कैंसर से लड़ते हुए दम तोड़ दिया और मीडिया में ये कोई ख़बर नहीं बनी - तब क्यों नहीं की हुआँ-हुआँ? चक दे इंडिया की सफलता के ठीक बाद, जब अपने किंग 'क्रिकेट' ख़ान दक्षिण अफ़्रीका में क्रिकेटरों के साथ गलबँहिया कर हॉकी को बेशर्मी से छका रहे थे - तब क्यों नहीं की हुआँ-हुआँ? जिस दिन ये पढ़ा अख़बार में, कि एक क्रिकेटर की मैच की कमाई 40 हॉकी खिलाड़ियों की मैच की कमाई के बराबर है - उस दिन क्यों नहीं की हुआँ-हुआँ? और हाँ, ये "एक क्रिकेटर= 40 हॉकी खिलाड़ी" - वाला आँकड़ा 10 साल पहले का है, अब तो शायद कैलकुलेटर भी तुलना करने में शर्मा जाए!
तो ख़ामोश बैठे, बरसों तलक मर्ज़ को मौत बनता देखते रहने के बाद, हुआँ-हुआँ करना है तो करें, लेकिन इतना याद रखें कि समय रहते हुआँ-हुआँ करते, तो आज राग कुछ और होता।
शायद राग क्रंदन के स्थान पर वो राग वंदन होता और शायद हम हुँआ-हुँआ नहीं, आँहु-आँहु करते झूम रहे होते!
Wednesday, 5 March 2008
पार्डन माई ब्रोकेन इंग्लिश
मैं जेब में हाथ डाले इधर-उधर देख रहा हूँ, समय काट रहा हूँ। पत्नी बगल में एक ब्यूटी पार्लर में बाल बनवाने गई है। अंदर भी बैठा जा सकता था, लेकिन ज़िंदगी में आजतक कभी लेडिज़ तो क्या, सैलून छोड़कर किसी जेंट्स ब्यूटी पार्लर में भी क़दम नहीं रखा, जहाँ सुना है बाल कटवाने के अलावा भी कई और उपायों से लड़कों की सुंदरता को सँवारा जाता है। भय कहें, संकोच कहें, भीतर नहीं जा सका। बाहर ठंड में ठिठुरता टहलक़दमी करता रहा।
कुछ पल बीते होंगे, देखा ट्राम स्टेशन पर दो लड़कियाँ खड़ी हैं, गोरी, आपस में बातें कर रही हैं, मेरी ओर भी देख रही हैं। कुछ पल और बीते, देखा दोनों मेरी तरफ़ आ रही हैं, मुस्कुराते हुए। दिल बल्लियों उछला कि नहीं इसका मुझे भान नहीं, मगर इतना अवश्य था कि समयकाटू अवस्था में ज़रा रोमांच ज़रूर अनुभव होने लगा। समयकाटू अवस्था कुछ ऐसी थी कि सभी ओर देख-दाख लेने के बाद भी कुछ देखने लायक ना बचा, तो दूकान के ऊपर लगी घड़ी को ही बार-बार देख रहा था। तापमान कभी -1 तो कभी -1.5 होता जाता था। कभी सात, सवा सात बना जाता, तो कभी सात बीस।
और दोनों लड़कियाँ आ ही गईं। मगर साहब...कहानी यहीं समाप्त। जो वो मुझसे कहें, वो मेरे पल्ले ना पड़े, और मैं जो अँग्रेज़ी बोलूँ, वो उन्हें ना समझ आए। मेरे रोमांच का अंत कुछ ऐसा हुआ - गोरियाँ जैसे मुस्कुराते आई थीं, वैसे ही चली गईं। मैं हक्का-बक्का खड़ा रहा।
फिर एक ट्राम आई, दोनों उसपर बैठीं, ट्राम चल पड़ी। दोनों ने जाते-जाते मेरी ओर देखा या नहीं पता नहीं, मगर मैंने देखा। और जब देखा तो वो मेरी ओर नहीं देख रही थीं।
दोनों चली गईं, एक पहेली छोड़कर। मुझसे ट्रेन की लाईन के बारे में पूछ रही थीं? ट्राम का नंबर जानना चाहती थीं? कोई पता पूछ रही थीं?या कोई मदद माँग रही थीं? - मुझे कुछ पता ही नहीं चला कि वो आख़िर आई क्यों थीं मेरे पास।
और ये स्थिति इसलिए थी क्योंकि मुझे उनकी भाषा - फ्रेंच और फ़्लेमिश - नहीं आती थी, और उनको अँग्रेज़ी नहीं आती थी। गोरे होने के बावजूद अँग्रेज़ी नहीं आती थी।
बेल्जियम में ऐसे कई क्षण आए, जब भाषाई उलझन पेश आई। अँग्रेज़ी की अल्प समझ होने के बावजूद, अक्सर ऐसा हुआ कि, अँग्रेज़ी भाषाई पुल की भूमिका निभाने में नाकाम रही। ये अगर भारत के किसी क़स्बे-मोहल्ले की बात होती तो आश्चर्य नहीं होता, लेकिन ये तो गोरों का देश था। गोरों को अँग्रेज़ी नहीं आती - मुझे ज़रूर आश्चर्य हुआ, क्योंकि भूरे अँग्रेज़ों के साए से प्रभावित और आक्रांत भारत में समझ तो ऐसी ही हो गई है, कि गोरा मतलब अँग्रेज़। मगर गोरा होना और अँग्रेज़ होना - दोनों अलग-अलग बातें हैं, ये बात बेल्जियम के अँग्रेज़ी ना जाननेवाले गोरे-गोरियों के संपर्क में आने के बाद ही समझ में आई।
अब मुझ जैसे प्राणी को आश्चर्य भले हो रहा हो, लेकिन गोरों के लिए ये कोई आश्चर्य की बात नहीं। यूरोप में, ब्रिटेन से बाहर निकल जाएँ, तो चाहे बेल्जियम हो, या फ़्रांस, या इटली, या स्पेन, वहाँ ऐसे गोरे-गोरियों की भरमार होगी, जिन्हें अँग्रेज़ी नहीं आती। लेकिन इससे क्या कोई फ़र्क़ पड़ता है? नहीं। वहाँ रहनेवाले आराम से अपनी ज़िंदगी बिता रहे हैं। उनके लिए उनके देश की भाषा ही सबकुछ है, उससे अधिक की उन्हें ना लालसा है, ना ज़रूरत।
मगर कल्पना कीजिए कि अपने भारत में, कम-से-कम देश की राजधानी में, कनॉट प्लेस के किसी मेट्रो स्टेशन पर, कम-से-कम उन दो गोरियों की सरीखी उम्र के युवाओं के बीच, क्या आज कोई ऐसा सोच सकता है, कि अँग्रेज़ी के बिना ज़िंदगी आराम से बीत जाए? जो जानता है, वो चौड़े होकर टहलता है। जो नहीं जानता, उसके दिल में ये खटका ज़रूर लगा रहता है कि हिंदी-बांग्ला-तमिल-गुजराती ठीक है, मगर अँग्रेज़ी भी आ जाती तो दुनिया जीत लेते। मैक्डॉनल्ड में खाना हो, या किंगफ़िशर की फ़्लाइट पर चढ़ना हो - अँग्रेज़ी जानने से कॉन्फ़िडेंस रहता है। और ना जानने से अक्सर नहीं रहता है।
भारत में अँग्रेज़ी संवाद की नहीं, अकड़ की भाषा बन चुकी है। मोबाईल फ़ोन कंपनी के किसी कर्मचारी से बातचीत करनी हो, एयरपोर्ट पर टिकट ख़रीदना हो-चेक इन करना हो-एयरहोस्टेस को बुलाना हो , मल्टीप्लेक्स सिनेमा में टिकट-कोल्ड ड्रिंक्स लेना हो, या फिर टाइटन-आर्चीज़-मैक्डॉनल्ड्स-वूडलैंड्स-शाहनाज़ ब्यूटी पार्लर जैसी चमचमाती दूकानों में पाँव रखना हो - क्या ये एहसास नहीं होता कि जो अँग्रेज़ीदां तबक़ा है, उस क्लब का ग्राहक सम्मान भी पाता है, सहूलियत भी।
और ये भेद-भाव केवल ज़ुबान तक ही सीमित नहीं रहता, अँग्रेज़ियत आपके पहनावे, चाल-ढाल से भी दिखनी आवश्यक है। बल्कि वो शायद अधिक आवश्यक है क्योंकि जहाँ अटके, वहाँ - लाइक-आई मीन-यू नो - जैसे बैसाखीरूपी शब्दों के सहारे अँग्रेज़ी ज्ञान बघारने की बेशर्म कोशिश करते, लेकिन जींस पहने-जेल लगाए किसी ग्राहक की अँग्रेज़ी, अँग्रेज़ी बोलने की कोशिश करते उस ग्राहक की अँग्रेज़ी से बेहतर समझी जाती है, जो टेरीकॉटन पैंट पहने-तेल लगाए आता है लेकिन बस शुगर को सूगर बोल जाने के कारण शर्मा जाता है। बात अगर केवल अँग्रेज़ी ज्ञान की होती तो जींसधारी को भी अपनी अल्पज्ञता पर वैसी है शर्म आती जितनी कि टेरीकॉटन पैंटधारी को। लेकिन बेशर्मी शर्म पर हावी रहा करती है।
और ये सब हुआ है इसलिए क्योंकि भारत ने गोरों को तो देखा, लेकिन उन गोरों को कभी नहीं देखा, जिन्हें अँग्रेज़ी नहीं आती। लेकिन क्या अँग्रेज़ी जाननेवाले गोरों और अँग्रेज़ी नहीं जाननेवाले गोरों में कोई अंतर है? नहीं है। दोनों अपनी-अपनी दुनिया के मालिक हैं। बेल्जियम-फ्रांस-जर्मनी-इटली-स्पेन-नॉर्वे-फ़िनलैंड-डेनमार्क-रूस के निवासी किसी भी कीमत पर ब्रिटेन-अमरीका-कनाडा-ऑस्ट्रेलिया से हीन या कमतर नहीं हैं। अँग्रेज़ी नहीं जाननेवाले गोरे, ना ये सोचकर मन मारे रहते हैं कि उन्हें अँग्रेज़ी नहीं आती, और ना अँग्रेज़ी जाननेवाले गोरे, ये सोचकर कि उनको अँग्रेज़ी आती है, इठलाते फिरते हैं। दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। भारत में ये बड़प्पन नहीं दिखाई देता।
यूरोप की राजधानी कहे जा सकनेवाले ब्रसेल्स में ही टहलते हुए एक दिन मैं और मेरी पत्नी भटक गए। मेरी पत्नी ने फ़्रेंच के कुछ वाक्य सीख रहे थे, उन टूटे-फूटे वाक्यों के सहारे उसने फ़ुटपाथ पर जैकेट-टोपी-मफ़लर में लिपटे एक पढ़े-लिखे से लग रहे बुज़ुर्ग से संवाद स्थापित किया। पहले फ़्रेंच, फिर अँग्रेज़ी में कुछ वाक्यों के सहारे उस बुज़ुर्ग ने, एक चौराहे पर जाकर हमें रास्ता दिखा दिया।
चलते समय मेरी पत्नी ने उसे - "मेसी" - फ़्रेंच में धन्यवाद देते हुए कहा - "पार्डन माई ब्रोकेन फ्रेंच।"
जवाब में उस बुज़ुर्ग ने भी कहा - "पार्डन माई ब्रोकेन इंग्लिश।"
क्या भारत में 'प्रॉपर इंग्लिश' बोलनेवाले और 'ब्रोकेन इंग्लिश' बोलनेवाले, किसी चौराहे पर एक साथ, बिना किसी हीन-भावना के-बिना किसी श्रेष्ठ भावना के, पूरे आत्मविश्वास के साथ, अपनी-अपनी राह पकड़, उसपर नहीं चलते रह सकते। बिना इठलाए, बिना हिचकिचाए। थोड़ी बहुत अँग्रेज़ी तो सबको आती ही है ना? ये वाक्य तो आपने भी सुना ही होगा अपने आस-पास, कभी-ना-कभी - "जानते तो हैं यार, मगर बोल नहीं पाते, हिचकिचाहट होती है।"
क्या साहबों की भाषा सीखकर बड़ा साहब दिखने की कोशिश ही इस नक़ल का अंत है? बड़प्पन की नक़ल क्यों नहीं हो रही?
Friday, 1 February 2008
क्या मुस्कुराना भूल गया बिहार?
इसी उक्ति पर पटना में अपने भाई के साथ चर्चा हो रही थी, मैंने कुछ मिनटों तक भाई को उस दिलचस्प उक्ति के बारे में समझाने की कोशिश की। वो बिल्कुल समझ गया, और कहा – एतना घुमाके बोलने का क्या ज़रूरत है, सीधे बोलिए ना भाई कि - ‘क़ाबिल’ नहीं बनना चाहिए!
गागर में सागर भरनेवाली ऐसी कितनी ही विशुद्ध बिहारी उक्तियों के रसास्वाद के लिए तरसते हैं विदेशों में बसे बिहारी।
ब्रिटेन में बिहारियों की संख्या कितनी है – बताना मुश्किल है। कोई जुगाड़ बैठाकर, गणित-विज्ञान आदि का सहारा लेकर अंदाज़ा लगाया जाए, इसमें भी कई पेचीदगियाँ हैं। फिर भी मोटा-मोटी बात की जाए तो चार चीज़ों से अंदाज़ा लग सकता है।
पहली बात ये कि अंतिम जनगणना के हिसाब से ब्रिटेन में बाहर के देशों से आकर बसे लोगों में आधे से अधिक एशियाई हैं। दूसरी कि इनमें सबसे अधिक संख्या है भारतीयों की, जो कोई साढ़े दस लाख है और जो ब्रिटेन की कुल आबादी का 1.8 प्रतिशत हिस्सा है। वैसे इनमें शुद्ध भारतीय नागरिकों की संख्या कम ही होगी, भारतीय मूल के लोग अधिक हैं। तीसरी बात ये कि इन भारतीयों में सबसे अधिक संख्या है गुजरातियों की, उनकी संख्या है साढ़े छह लाख। और चौथी बात ये कि जो बाक़ी बचे साढ़े चार लाख भारतीय हैं उनमें भी पंजाबियों की संख्या सर्वाधिक है। इसप्रकार बाद बाक़ी जो संख्या बचती होगी उसमें ही बिहारियों का अस्तित्व समाहित होगा।
ख़ैर उबाऊ आँकड़ों को परे रख सपाट भाषा में ब्रिटेन के बिहारी समुदाय को, अल्पसंख्यकों में भी अल्पसंख्यक कहा जाए तो इसमें कोई ग़लती नहीं होगी।
पंजाब यहाँ आए दिन एशियाई बहुल इलाक़ों में किसी बीएमडब्ल्यू-मर्सीडिज गाड़ी के साउंड सिस्टम से निकलते अस्थिकंपक संगीत के रूप में दिख जाएगा; गुजरात यहाँ किसी भी जेनरल स्टोर के काउंटर पर खड़े विनम्र दूकानदार की मुस्कुराहट में मिल जाएगा; ब्रिक लेन नामक इलाक़े में रोहू और इलिश माछ की सुगंध के साथ बंगाल भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा लेगा और ईस्ट हैम जैसे इलाक़ों में सुपरस्टार रजनीकांत की फ़िल्मों के पोस्टरों के रूप में दक्षिण भारत का चेहरा भी दिख जाएगा; लेकिन बिहार उसी तरह ढूँढे नहीं मिलेगा जिसतरह यूपी,एमपी या ऐसे अन्य प्रदेशों का अस्तित्व।
वैसे बिहारियों की कमज़ोर उपस्थिति में अस्वाभाविक कुछ नहीं है क्योंकि गुजराती और पंजाबी समुदाय के लोगों का थोक संख्या में बाहर निकलना ब्रितानी राज के दौरान ही शुरू हो चुका था। तो पुराने वटवृक्ष से निकली शाखाओं से वटवंश का प्रसार तो होगा ही।
बिहार के लोग अभी बाहर निकल ज़रूर रहे हैं, लेकिन ज़्यादातर प्रवासी अभी प्रोफ़ेशनल हैं, पहली पीढ़ी के हैं, जिनकी दुनिया दफ़्तर में गिनती के सहकर्मियों और घर पर एकाध सदस्यों के बीच बतियाने तक सिमटी है। घर का असल मतलब तो उनके लिए अभी भी वही बिहार है, वही मोहल्ला, वही गलियाँ, वही सड़कें, वही माटी, जिनके आशीष या श्राप से वे सात समुंदर पार पहुँचे। देसी भाषा में, पहली पीढ़ी के बिहारी प्रवासियों में बिहार के लिए एक ‘टान’ ज़रूर बसता है।
बिहार से छुट्टियों के बाद लौटनेवाले हर बिहारी से अपेक्षा होती है कि वह साथी बिहारियों के लिए अनुभवों-क़िस्सों की मोटरी लेकर आएगा। नीतिश राज में कुछ बदला कि नहीं, क्राइम घटा कि नहीं, बिजली रहती है कि नहीं, ऐसी आम उत्कंठाओं को शांत करने के बाद बोनस जानकारियाँ दी जाती हैं; कि अब पटना में भी पित्ज़ा-बर्गर वाली फ़ास्ट-फ़ूड दूकानें खुल चुकी हैं, जहाँ जींसधारी बालाएँ दिल्ली-बंबई को टक्कर देती नज़र आती हैं; कि अब पटना में भी रेडियो मिर्ची पहुँच चुका है, आदि-इत्यादि।
लेकिन यात्रा-वृत्तांत बिना हास्यरसास्वाद के समाप्त नहीं होता; बेगूसराय वाले दोस्त को खोजकर बताई जाती है बात कि ज़ीरो माइल पर एक साइनबोर्ड दिखा- ‘दिलजले हेयर कटिंग सैलून’...ठहाके लगते हैं और फिर बात पुराने दिनों में लौट जाती है; बेगूसरायवासी मित्र बताता है कि छात्रावस्था के दौरान रवीना टंडन बेगूसराय में ख़ासी पॉपुलर थी, और हो सकता है उसी के किसी ‘दिलजले’ आशिक़ ने सैलून का नाम......बात ठहाकों में खो जाती है। बिहार शब्द प्रवासी बिहारियों के लिए जी को हल्का कर देनेवाली मुस्कुराहट बन जाता है।
लेकिन फिर पटना में अपने भाई की एक बात याद आती है – बाहर हो तो मज़ा आ रहा है, यहाँ रहोगे तो जिस बात पर हँसी आता है उसी पर चिल्लाओगे!
मैंने अचानक ग़ौर किया कि सचमुच वहाँ आम जनजीवन में मुस्कुराहट कम ही दिखती है। बैंक हो, सरकारी दफ़्तर हो, होटल हो, सिनेमाघर हो, ऑटो हो, रिक्शा हो – मुस्कुराते चेहरे कम ही दिख रहे हैं। कहीं तनाव दिखता है, कहीं विषाद, कहीं रोष, कहीं अहंकार, कहीं क्रोध, कहीं झल्लाहट। मुस्कुराकर बात करो तो भी कोई नहीं मुस्कुराता। जान-पहचान के बाहर ऐसा एक भी व्यक्ति याद नहीं पड़ता जिसने मुस्कुराकर बात की हो।
तो क्या वाकई सात समुंदर पार बैठे बिहारियों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरनेवाला बिहार मुस्कुराना भूल गया है, या मेरी ही नज़र धोखा खा गई।
(ये लेख पिछले वर्ष 'प्रभात ख़बर' के बिहार विशेषांक में छपा था। अगले सप्ताह पटना जा रहा हूँ, इस उम्मीद के साथ कि भगवान करे सचमुच ही मेरी नज़र एक साल पहले धोखा खा गई हो)
Monday, 28 January 2008
कैसे दिखाएँ देशभक्ति
देशभक्ति प्रदर्शन के ऐसे प्रतीकात्मक अवसरों पर धर्मसंकट और भी कई बार आए हैं। अक्सर ऐसा होता है कि जब जन-गण-मन बज रहा हो, तो मुश्किल में पड़ जाता हूँ कि कैसी मुद्रा में रहूँ। सावधान होना सही होगा या कि, घर के सोफ़े पर मरे रहने, या दफ़्तर की कुर्सी पर पड़े रहने, की मुद्रा में बदलाव के बिना काम चल जाएगा। अभी तक दो तरह की राय मिली है। एक में हिकारत के साथ त्यौरियाँ चढ़ाकर कहा गया -सोचना क्या है, बिल्कुल खड़े हो जाना चाहिए! दूसरे में शरारत के साथ मुस्कुराते हुए काट सुझाई गई - छत के नीचे खड़े होने पर ये नियम नहीं लागू होता है!
बहरहाल, याद नहीं पड़ता कि स्कूल में इस बारे में कोई नियम क़ानून सिखाया गया था। और भारत सरकार की राष्ट्रगान के बारे में आधिकारिक वेबसाइट पर भी जाकर चेक किया, वहाँ भी इस बारे में कुछ नहीं लिखा है, कि राष्ट्रगान बजे तो क्या करना चाहिए। ऐसी स्थिति में इस बार भी जब राष्ट्रगान बजा, असमंजस की स्थिति आई, और कोई फ़ैसला करूँ-करूँ, तबतक 52 सेकेंड निकल गए!
देशभक्ति-राष्ट्रगान-राष्ट्रीय प्रतीक ये सब एक गूढ़ पहेली वाले शब्द हैं हमारे समाज में। मातृभक्ति-पितृभक्ति-गुरूभक्ति-ईशभक्ति को तो सारे जहाँ को दिखा सकते हैं, महसूस कर सकते हैं। लेकिन देशभक्ति का क्या किया जाए? सैनिक हों-सुरक्षाकर्मी हों तो कह सकते हैं, कि देश के लिए जान हाथ में लेकर घूमते हैं; खिलाड़ी हों-कलाकार हों, तो बोल सकते हैं कि देश की प्रतिष्ठा का भार कंधों पर उठाकर घूमते हैं।
लेकिन उनका क्या, जिन्होंने अपनी-अपनी दुनिया में चाहे जितना कुछ बटोर-समेट लिया है, लेकिन हैं वह उसी भीड़ का हिस्सा - जिसे आम जनता कहा जाता है; या दूसरे शब्दों में - जो ख़ास नहीं है; या सीधे शब्दों में - जो सेलिब्रिटी नहीं हैं; या कठोर शब्दों में - जो लाख माल-जंजाल बटोरने के बावजूद, पद-प्रतिष्ठा अर्जित करने के बावजूद, एनआरआई बनने या अमरीकन-ब्रिटिश पासपोर्ट लेने के बावजूद, हैं उतने ही आम, जितना कोई भी दूसरा आम आदमी होता है। आम आदमी का नाम नहीं होता है।
अब संकट इसी आम आदमी के भीतर की देशभक्ति का है। वो क्या करे कि देशभक्ति दिखे?
तो उसकी देशभक्ति दिखती है कभी क्रिकेट के मैदान में झंडा लपेटकर चिल्लाते हुए (बीयर चढ़ी हो, तो उत्साह भी परवान पर रहता है); तो कभी दिखती है स्वदेस और रंग दे बसंती देखकर सुबकते हुए(परिवार साथ रहे इस समय तो और अच्छा)।
और चिल्लाने और नाकभिंगाउ रूलाई से भी जी ना भरे, तो ई-देशभक्ति ज़िन्दाबाद! दुनिया भर की वेबसाइटों पर जाकर अपनी देशभक्ति उगलिए - कि भगत सिंह को भारत रत्न देना चाहिए और सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी से भी बड़े नेता थे, या और नहीं तो यही कि भारतीय टीम को देश की इज़्ज़त के लिए ऑस्ट्रेलिया से वालस लौट आना चाहिए!
इसके बाद देशभक्ति का असहनीय उफ़ान, जब थम जाए, तो फिर जो चाहे कीजिए। काला पैसा कमाइए, काले कारनामे कीजिए, कामचोरी कीजिए, पढ़ाई के समय लफंगई कीजिए, अपने ही देश की संपत्ति को चूना लगाइए, अपने ही किसी देशवासी का हक़ मारिए - सब चलेगा।
देशभक्ति दिखाने का मौक़ा तो फिर आएगा ही - इंडिया-पाकिस्तान मैच, कोई और देशभक्ति वाली फ़िल्म, 15 अगस्त...26 जनवरी - हैप्पी रिपब्लिक डे!हैप्पी इंडिपेंडेंस डे!
पुनश्चः वैसे ये अलग बात है कि जन-गण-मन मैं अक्सर गुनगुनाता रहता हूँ, मुझे इसका सुर बड़ा अच्छा लगता है।(एक दो बार तो बाथरूम में भी गुनगुना पड़ा था कि स्थान का भान होने पर तुरंत थम गया) कैप्टेन राम सिंह ठाकुर का तैयार किया ओरिजिनल धुन शानदार है ही। कभी सुनकर देखिए ए आर रहमान के कम्पोज़्ड जन-गण-मन एलबम को। भारतीय शास्त्रीय संगीत के तमाम दिग्गज नामों ने, आठ रागों में, राष्ट्रगान को गाया और बजाया है। देशभक्ति अपनी जगह होगी, लेकिन यहाँ अलग-अलग आवाज़ों और साज़ों में जन-गण-मन को सुनने पर, वह एक ओजस्वी राष्ट्रगान से अधिक एक मधुर संगीतमय कृति के जैसा लगता है। एक सुंदर अनुभूति।
आप भी सुनिए रहमान का जन-गण-मन एलबम