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Thursday, 13 November 2008

एक लेखकाना शाम

शाम हो रही है, जिस काम के लिए पाउंडरूपी पैसे मिलते हैं, वो काम ख़त्म है, ऑफ़िसिआए माहौल में कंप्यूटर के अमूर्त स्क्रीन या किसी ललना के मूर्त नैन निहारने, या फिर ईश्वरप्रदत्त बोलने-सुनने की सुविधा के सहारे परनिंदा-परचर्चा का सुख लेने की उमर रही नहीं - सो बिल्कुल समय पर उस दफ़्तर से स्वयँ को बाहर ढकेल लिया।

नवंबर है, हवा तेज़ है, सर्द है, लेकिन मन में ना जाने कहाँ से गुलज़ार की मीठी धूप वाला ख़याल आ गया, ठंड मीठी लगने लगी - समझ गया, आज दिल लेखकाना हो रहा है।

परिभाषानुसार और परंपरानुसार लेखकों की फ़ितरत भीड़ से अलग होनी चाहिए, तो भीड़ जहाँ दफ़्तर से चार क़दम दूर बसे रेलवे स्टेशन में घुसी जा रही थी, मुझमें समाए लेखक ने मुझे चार किलोमीटर दूर एक दूसरे रेलवे स्टेशन की ओर मोड़ दिया - होठों पर गुनगुनाहट, आँखों में ऑब्ज़र्वेशन, मस्तिष्क में सोच और आत्मा में लेखक को बसाए हम चल पड़े भीड़ से अलग, एक लेखकीय सफ़र पर।

स्टेशन आ गया, शाम का समय है, दफ़्तर छूटने का समय, कर्मरत प्राणी उस दिन के कर्म के संपादन के बाद रेलगाड़ियों की ओर भागे जा रहे है, डेली पैसेंजर्स गाड़ी किस प्लेटफ़ॉर्म पर लगी है ये पढ़ने के लिए भी नहीं रूकते, चलते-चलते ही स्क्रीन पढ़ लेते हैं, जो धुरंधर हैं वे भीड़ में भी आड़े-तिरछे होकर उसी कौशल से सरसराते आगे बढ़े जा रहे हैं जिसतरह पटना के बाकरगंज रोड पर लगे जाम के दौरान दो चक्कों वाले वाहनों के सवार तीन-चार चक्कों पर लदी सवारियों से आगे निकल जाते हैं।

अधिकतर लोगों के हाथ में शाम में बँटनेवाले मुफ़तिया अख़बार हैं, जिनमें एक-दो ख़बरें पढ़ने को और दसियों देखने को मिल जाती हैं, कोई उनको देखते-देखते चल रहा है तो कोई चलते-चलते उनको देख रहा है...और उस शाम को कुलबुलाया एक लेखक चल भी रहा है और देख भी रहा है - भीड़ की तरह अख़बार को नहीं, अख़बार थामी भीड़ को।

कोई भागनेवालों की निगाह में धीमे चल रहा है, तो कोई धीमे चलनेवालों की निगाह में भाग रहा है, लेकिन भीड़ ट्रेन की ओर बढ़ी जा रही है, उसमें वेग है, गति भी और दिशा भी।

मगर इस वेग के बीच एक जगह कुछ ठहरा हुआ दिखाई दे रहा है, भीड़ आगे जाकर थोड़ा दाएँ-बाएँ ख़िसक रही है, फिर वेगवान हो जा रही है।

थोड़ा समीप जाता हूँ, देखता हूँ, एक विकलांग है, आगे बढ़ रहा है, ठहर जा रहा है, उसका संतुलन नहीं बन पा रहा।

और आगे जाता हूँ, वो केवल शारीरिक विकलांग ही नहीं, दिमाग़ी तौर पर भी विकलांग है, कभी इधर देख रहा है, कभी उधर देख रहा है, मगर समझ में नहीं आ रहा, क्या देख रहा है, साथ कोई नहीं है।

मैं एक पल उसे देखता हूँ, सामने लगी घड़ी देखता हूँ, प्लेटफ़ॉर्म देखता हूँ, वहाँ खड़ी ट्रेन देखता हूँ, उसकी ओर लपकती भीड़ देखता हूँ, एक बार फिर घड़ी देखता हूँ - और सात मिनट बचे हैं ट्रेन के छूटने में।

मगर आज तो मैं भीड़ का हिस्सा नहीं, जो सब करेंगे वो नहीं करना है, उसपर से सामने चारों ओर छितराए वैभव, आधुनिकता, विकास और सुंदरता को चुनौती देनेवाला एक कैरेक्टर खड़ा है, सभ्यजन क्या करते हैं, इसे देखने का इतना बड़ा अवसर क्या हाथ से जाने दिया जा सकता है - सामान्य दिन होता तो बात अलग थी, आज तो मेरे भीतर लेखक समाया था, उसने आगे बढ़ने से रोक दिया - ट्रेन जाती है तो जाए, आधे-एक घंटे देर ही होगी ना, अगली ट्रेन से ही सही।

मैं और मेरे भीतर समाया लेखक एक कोने में दीवार से सट गए, ऐसे जहाँ से विकलांग दिखाई भी दे, और भीड़ का रास्ता भी ना रूके।

भीड़निर्माता एक के बाद एक करते बढ़ रहे हैं, विकलांग भी बढ़ रहा है, रूक रहा है, लेकिन भीड़ का कोई भी अंश रूकना तो दूर ठिठक भी नहीं रहा। एक क्षण मेरे भीतर भी कर्तव्यबोध की टीस उठती है, कि लेखकीय चोले को त्याग उस विकलांग की सहायता की जाए, लेकिन एक तो कमज़ोर इच्छाशक्ति, दूसरा लेखकीय उत्कंठा - कि भीड़ क्या करती है, ये सोचकर मैं जहाँ हूँ वहीं बना हूँ।

विकलांग अचानक रूकता है, इस बार उसके ठीक बगल में एक भारतीय साहब खड़े हैं जिन्हें मैं देख रहा हूँ कि बड़ी देर से खड़े हैं, चेहरे पर अतिगंभीर भाव लिए, कभी अख़बार पलट रहे हैं, कभी टीवी स्क्रीन पर ट्रेनों की समयसारिणी देख रहे हैं, मगर पीछे नही् देख रहे जहाँ से विकलांग आ रहा था और अब उनके ठीक बगल में इधर-उधर सिर घुमाता, मुँह हिलाता खड़ा है।

भारतीय साहब ने नैनों के दृष्टि क्षेत्र के विस्तार में विकलांग को देखा, फिर इधर देखा-उधर देखने लगे और पन्ने पलटने लगे।

प्लेटफ़ॉर्म के ठीक गेट के पास खड़ी एक काली युवती भी बार-बार पीछे की ओर देख रही है, चेहरे पर दया है उसके, लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि वो उस विकलांग को देखने के लिए पीछे मुड़ रही है और इस कारण द्रवित है, या किसी और को देखने के लिए पीछे मुड़ रही है और उसका चेहरा ही करूणामय है।

वो फ़ोन निकालती है, किसी से बात करती है, क्या कहती है पता नहीं, लेकिन फिर वो ट्रेन की ओर बढ़ जाती है। मतलब लगता तो यही है कि वो उस विकलांग को नहीं देख रही थी। मतलब ये भी कि जिनका चेहरा करूणामय हो, वो सचमुच करूण हों, ये ज़रूरी नहीं।

प्लेटफ़ॉर्म से पहले लगे गेट के पास नेवी ब्लू पैंट, स्काई ब्लू कोट और स्काई ब्लू टोपी लगाए, एक रेलवे कर्मचारी भी तो खड़ा है, वो क्यों नहीं कोई मदद कर रहा है उस विकलांग की। देख तो रहा है वो उसकी ओर? लेकिन हो सकता है पहले भी ऐसी स्थिति से पाला पड़ा हो उसका, क्योंकि चेहरा तो अनुभव से तपा हुआ लगता है उसका। ख़ैर वो जहाँ है वही हैं, मैं भी जहाँ हूँ वहीं हूँ। इस बीच वो भारतीय महाशय ट्रेन की ओर बढ़ चुके हैं, शायद घड़ी के सात बजाने की प्रतीक्षा कर रहे थे, सात बजे के बाद जाने पर डेढ़ पाउंड की बचत हो सकती है।

आख़िर वो विकलांग टिकट खिड़की की ओर बढ़ रहा है, इसका मतलब उसे इतना अंदाज़ा तो है कि जाना किस तरफ़ है, मैं एक निगाह खिड़की के पीछे बैठे रेल कर्मचारी पर डालता हूँ जो सामान्य अँग्रेज़ लग रहा है और जो विकलांग की ओर देख भी रहा है, लगता है कि वो उस विकलांग की सहायता अवश्य करेगा।

फिर में एक निगाह घड़ी पर डालता हूँ जो कह रही है कि केवल दो मिनट रह गए हैं ट्रेन छूटने में - फिर मैं भी आगे बढ़ जाता हूँ।

स्थिति वही है जो अंतिम समय में ट्रेन में चढ़ते हुए होती है - भीड़ - मैं भीड़ में समा जाता हूँ, एक सीट के बगल में खड़ा हो जाता हूँ, कुछ ही क्षणों में पीं-पीं-पीं-पीं के साथ दरवाज़ा बंद होता है, ट्रेन चल पड़ती है।

ट्रेन में अधिकांश लोग पढ़ रहे हैं, चुपचाप, कोई मुफ़तिया बँटनेवाला अख़बार तो कोई दफ़्तर से टीपा हुआ अख़बार, कोई नोवेल थामे बैठा है तो कोई मैगज़ीन, तो कोई आईपॉड से बरसती हुई धुन में मगन है।

मैं भी अपने बैग से निकालता हूँ कुछ पन्ने - निर्मल वर्मा की एक कहानी और बाबा नागार्जुन की एक कविता - 'नया ज्ञानोदय' के नवंबर अंक में छपी है, इंटरनेट पर फ़्री है, कुछ पन्ने छाप लाया हूँ।

भीड़ भी पढ़ रही है, मैं भी पढ़ रहा हूँ - पर पता नहीं क्यों आज उस लेखकाना शाम को लिखे जानेवाले और पढ़े जानेवाले शब्दों पर संदेह-सा हो रहा है।

Saturday, 23 August 2008

अभिनव बिन्द्रा - एक समझदार अमीर?

"Wealth is the slave of a wise man. The master of a fool." ...(सेनेका- रोमन कवि, दार्शनिक, राजनीतिज्ञ)

"पता नहीं क्या समझता है अपने-आपको" - अभिनव बिन्द्रा के बारे में मेरी ये राय छह साल तक रही, अब उस राय पर मुझे संदेह हो रहा है। मगर इसलिए नहीं कि उसने देश का नाम रोशन किया, तिरंगे की लाज रखी, राष्ट्रगान बजवाया, और तथाकथित रूप से एक अरब से भी अधिक लोगों का मस्तक ऊँचा करवाया।

मुझे अपनी राय पर संदेह किन्हीं और कारणों से हो रहा है, ठीक उन्हीं कारणों से, जो अभिनव बिन्द्रा के ख़िलाफ़ जाते हैं।

जो सबसे बड़ी बात अभिनव बिन्द्रा के ख़िलाफ़ जाती है, वो ये, कि वो एक अत्यंत ही अमीर घर का लाड़ला है, उसने मेडल जीत ही लिया तो क्या? और जीता भी तो ऐसे खेल में जो, बकौल श्रद्धेय अफ़लातून जी के, राजा टाइप लोगों का खेल है।

मैं भी ऐसी ही राय रख रहा था, बहुतों ने तो ओलंपिक में अभिनव की जीत के बाद पत्र-पत्रिकाओं-टीवी पर उसकी पृष्ठभूमि पढ़ने-देखने के बाद अभिनव के बारे में एक नकारात्मक राय बनाई होगी, मैं तो छह साल से बनाए हुए था। मगर पता नहीं कब, अनायास कुछ सवालों ने आ घेरा -

कि अभिनव अगर अमीरज़ादा है तो क्या एक अरब वाले देश में वो अकेला अमीरज़ादा है?

कि अभिनव अगर राजा साहब टाइप है, तो क्या वो ऐसा अकेला राजा साहब टाइप है, बनारस से लेकर बलिया तक में ऐसे राजा साहब नहीं होते?

कि अभिनव की निशानेबाज़ी अगर रईसी का उदाहरण है, तो उसकी निशानेबाज़ी और सलमान-सैफ़-पटौदी साहब की निशानेबाज़ी में क्या कोई अंतर नहीं?

कि अभिनव के पिता यदि ये कहते हैं कि वो बचपन में नौकरानी के सिर पर गुब्बारे फोड़ता था, तो क्या अपनी औलाद के बारे में ऐसी डींग मारनेवाले उसके पिता ऐसे अकेले पिता हैं, टीवी पर गाना गानेवाले अपने नकलची बच्चों को देख सुबकते माता-पिता को क्या कहिएगा, अकेले बिन्द्रा साहब को धृतराष्ट्र की पदवी क्यों? फिर घर में नौकरों को उनकी हैसियत समझानेवाले बिन्द्रा साहब क्या ऐसे अकेले साहब हैं?

कि अभिनव को अगर अपने घर के कुत्तों की याद आती है, तो क्या श्वानों के प्रति ऐसा वात्सल्य रखनेवाला अभिनव अकेला व्यक्ति है?

कि अभिनव ने अगर विदेश में रहकर पैसे फूँककर ट्रेनिंग की, तो पैसे के बल पर विदेशों में रहकर शिक्षण-प्रशिक्षण करनेवाला क्या वो अकेला व्यक्ति है?

कि अभिनव ने अगर इंटरव्यू देते समय अकड़ दिखाई तो क्या ऐसी अकड़ दिखानेवाला वो अकेला सेलिब्रिटी है? सेलिब्रिटी तो दूर, ज़रा अपने इलाक़े के कलक्टर-डीएम-डीसी से ही बात करके देख लीजिए, अकड़ का अर्थ समझ में आ जाएगा।

ऐसे अमीर, ऐसे राजा साहब, ऐसे श्वानप्रेमी, ऐसे विदेशपठित-विदेशप्रशिक्षित लोग एक-दो नहीं हज़ारों और लाखों होंगे भारत में। लेकिन अभिनव बिंद्रा की गिनती उस भीड़ से अलग करनी होगी। अभिनव उन चंद लोगों में गिना जाना चाहिए जिसने अपनी संपन्नता को एक अर्थ दिया है। वो भारत का पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक विजेता है - ये बात इतिहास में दर्ज हो चुकी है, इतिहास ये नहीं देखता कि नायकों की पृष्ठभूमि क्या होती है, इतिहास देखता है, उसकी उपलब्धि को।

अभिनव की उपलब्धि पर छींटाकशी करना थोड़ी ज़्यादती लगती है, उसमें ख़ामियाँ हैं, ये सत्य है, लेकिन इस आधार पर उसे ख़ारिज़ कर देना एक दूसरे सत्य से मुँह चुराने के जैसा है। अभिनव के बहाने फिर वही टकराव का मनहूस रास्ता सामने खड़ा है जो पता नहीं किसी मंज़िल पर जाता भी है या नहीं? इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं कि दिल्ली और देहात की लड़ाई अभिनव के मेडल जीतने के बाद भी उसी जगह है, जिस जगह उसके मेडल जीतने से पहले थी, ऐसे में एक व्यवस्था पर चोट ना कर, किसी एक को निशाना बनाना, वो भी उसपर जिसने कुछ तो किया, ये थोड़ी छोटे दिल वाली सोच लगती है।

ये सवाल हमेशा खड़ा मिलता है - उपलब्धि किसकी बड़ी होनी चाहिए - उसकी, जिसके पास कुछ भी नहीं, या उसकी, जिसने बहुत कुछ छोड़ा।

जिनके पास कुछ नहीं, उनकी उपलब्धि की प्रेरणादायी कहानियों से हम हमेशा दो-चार होते हैं,अपनी हिम्मत-मेहनत-लगन से तकदीर बदलनेवालों की ऐसी कहानियाँ जीवन-पुरूषार्थ-कर्म के प्रति आमजनों के विश्वास को जीवित रखती हैं। मगर ग़ौर से देखा जाए तो कुछ हासिल करने के लिए- जिनके पास सबकुछ है - शायद उनको भी उतना ही संघर्ष करना पड़ता है जितना जिनके पास नहीं है उनको।

अभिनव अमीर है, स्मार्ट है, अंग्रेज़ीदां है, सेलिब्रिटी भी है - भौतिक सुखदायी ऐसे कौन से साधन हैं जो उसकी पहुँच से बाहर रहे होंगे? लेकिन उसने अपने आप पर नियंत्रण किया होगा, बहुत सारे प्रलोभनों पर विजय पाई होगी, अपनी संपन्नता को एक मक़सद दिया होगा, और तब जाकर उसने हासिल की, एक ऐसी उपलब्धि, जिसपर घरवाले जो कहना है कहें, बीजिंग में जुटे बाहरवाले एक उपलब्धि की निगाह से देखते हैं।

यदि मात्र संपन्नता से ही सबकुछ जुटाया जा सकता तो क्या आज धन्नासेठों की अट्टालिकाएँ स्वर्ण पदकों से नहीं चमचमा रही होती? अभिनव की उपलब्धि शायद गाँव-देहात में सिमटे लोगों के लिए कोई मायने नहीं रखती होगी, लेकिन आज के आधुनिक भारत का भार कंधे पर टाँगे टहल रहे युवाओं के लिए एक आदर्श बेशक बन सकती है।

सोचिए कि अगर दो-चार प्रतिशत धन्नासेठ भी अभिनव बिन्द्रा की ही तरह अपनी धन-दौलत ऐसी किसी किसी चीज़ में लगा दें, जिससे कि भारत को मेडल मिलता हो, तो उससे मेडल ही आएगा ना, वो मोटर-मोहिनी-मदिरा में तो ज़ाया नहीं होगा। और ऐसी कल्पना तो दिवास्वप्न ही होगी कि राजा टाइप लोग स्वयं ही, बेबात रंक सरीखों में अपना ऐश्वर्य लुटा देंगे।

मैं इसलिए अपनी राय कि - "पता नहीं क्या समझता है अपने-आपको" - इस राय को बदलता हूँ। अब मुझे लगता है कि - "शायद समझता है वो अपने-आपको"।

शायद समझता हो वो सेनेका की इस उक्ति का सार - "Wealth is the slave of a wise man. The master of a fool."

Tuesday, 5 August 2008

फिर आना मम्मी

मम्मी आज वापस भारत चली गई, घर ख़ाली हो गया, ज़िन्दगी पुराने ढर्रे पर लौट आई, पिछले पंद्रह साल से चली आ रही ज़िंदगी, घर से बाहर रहने की ज़िंदगी - अपनी ज़िंदगी, अपनी आदतें, अपना परिवार, अपना घर, अपना बसाया घर।

ठीक पंद्रह साल पहले नियति ने एक पगडंडी पर ला खड़ा किया था, जो घर से बाहर जाती थी। फिर तो घर से बाहर का रास्ता दिखानेवाली उस पगडंडी से न जाने कितनी बार गुज़रता रहा - बनारस-घर, दिल्ली-घर, गोहाटी-घर, कलकत्ता-घर, लंदन-घर...

हर बार उस पगडंडी के एक तरफ़ घर होता था, मम्मी होती थी, और दूसरी तरफ़ मैं होता था। कभी आता हुआ, कभी जाता हुआ।

आता तो मम्मी का खु़श चेहरा दिखाई देता, जाता तो हाथ हिलाती मम्मी खड़ी रहती। पहले ऑटो से हाथ हिलाया करता, फिर स्लीपर बोगी की खिड़की से, फिर एसी कम्पार्टमेंट के दरवाज़े पर खड़े होकर, और अब एयरपोर्ट के डिपार्चर लाउंज पर।

पंद्रह सालों से चला आ रहा ये सिलसिला अब तो एक आदत के जैसा लगने लगा था, साल-दर-साल छुट्टियों में घर जाना, मुस्कुराती मम्मी का घर के दरवाज़े पर खड़ा मिलना, कुछ हफ़्ते या फिर महीना भर घर पर रहना, फिर वापसी, मुस्कुराती मम्मी, हाथ हिलाते हुए विदा करती मम्मी।

लेकिन आज - कुछ अलग हुआ, आज मम्मी गई, और एयरपोर्ट के डिपार्चर लाउंज के बाहर खड़ा मैं हाथ हिलाता रहा।

महीने भर पहले भी ऐसा ही कुछ अलग हुआ था, एयरपोर्ट से बाहर मैं नहीं निकला, मम्मी निकली थी, मैं बाहर खड़ा था।

पिछले एक महीने से मम्मी साथ थी, पंद्रह साल में पहली बार ऐसा हुआ जब इतना लंबा अर्सा मम्मी के साथ बिताया, मम्मी को उस रूप से दूसरे रूप में देखा, जिसमें बचपन से आज तक देखता रहा था, इस बार वो हम भाई बहनों के खाने-पीने के इंतज़ाम में घिरी मम्मी नहीं थी, ना वो पूरे घर की सफ़ाई में भिड़ी हुई मम्मी थी, ना ही मोहल्ले में लडुआ की दूकान से बिस्कुट-साबुन-सर्फ़ या कॉलोनी की सब्ज़ी की दूकान से आलू-प्याज़-परबल लेकर घर लौटती हुई मम्मी थी।

इस बार मम्मी लंदन में थी, हमारे घर थी, वो हमारे साथ सुपरस्टोर में ख़रीदारी कर रही थी, मैक्डोनल्ड्स में आलू के चिप्स और वेजिटेबल पैटीज़ खा रही थी, मैडम तुसॉद्स में नक़ली शाहरूख़-सलमान तो नेहरू सेंटर में असली ओम पुरी-गिरीश कर्नाड के साथ फ़ोटो खिंचा रही थी, केम्बिज युनिवर्सिटी में नेहरू जी और मनमोहन सिंह का कॉलेज देख रही थी, और जिसने आज तक ना कोई समुंदर देखा, ना पहाड़, वो मम्मी सात समुंदर पार एडिनबरा में समुंदर किनारे टहल रही थी, स्कॉटलैंड के ख़ूबसूरत पहाड़ों के तले खड़ी थी!

लंदन की टूरिस्ट मम्मी, घर की गार्जियन मम्मी से बिल्कुल अलग थी। लंदन की मम्मी का चेहरा उत्साह से दमक रहा था, उसके पाँव समुंदर की लहरों से मिलकर थिरक रहे थे, उसके बढ़-चढ़कर फ़ोटो खिंचवाए जा रही थी। मम्मी उन सब जगहों पर हमारे साथ थी, जिन जगहों पर इससे पहले केवल मैं और मेरी पत्नी या कभी-कभार बाहर से आए कुछ दूसरे रिश्तेदार या दोस्त जाया करते थे।

मम्मी आज चली गई, पत्नी एयरपोर्ट से ही दफ़्तर निकल गई, मैंने छुट्टी ली है, तो मैं घर लौटा हूँ, घर पर आज महीने भर बाद ख़ुद चाभी से दरवाज़ा खोलना पड़ा, महीने भर से कॉल बेल बजाया करता और मम्मी दरवाज़े पर खड़ी मिलती।

वैसे अपनी चाभी से अपने कमरों के दरवाज़े खोलने का ये सिलसिला कोई नई बात नहीं, पहले होस्टल का कमरा होता था, फिर जहाँ-जहाँ रहा वहाँ के कमरे। पंद्रह सालों से ऐसा ही चल रहा है।

लेकिन पंद्रह सालों में आज पहली बार कुछ अलग-सा महसूस हो रहा है। पहली बार ये समझ पा रहा हूँ कि कि कैसा लगा करता रहा होगा मम्मी को - पिछले उन पंद्रह वर्षों से, जब वो हाथ हिलाती पहले बेटे को, और फिर बाद में बेटे-बहू को विदा करती होगी और वापस उन दीवारों की ओर लौटती होगी, जिसके हर कोने में-हर क़तरे में कुछ देर पहले तक कोई और भी बसा हुआ था।

मैं तो बस घंटे-डेढ़ घंटे में फ़ोन लगाकर मम्मी से बात कर स्वयँ को आश्वस्त भी कर लूँगा कि मम्मी की यात्रा कैसी रही, लेकिन आज ये कल्पना ही विचित्र लगती है कि कैसा लगता रहा होगा मम्मी को उन दिनों जब ना फ़ोन था ना मोबाईल, बस चिट्ठियाँ ही बताया करतीं ये हाल कि ट्रेन कितने घंटे देर से पहुँची और रास्ते में क्या-क्या हुआ।

आज लंदन के इस ख़ाली घर में घर से बाहर निकलनेवाली पिछले पंद्रह सालों की वे सारी यात्राएँ याद आ रही हैं। लंदन का ये ख़ाली घर आज कह रहा है - फिर आना मम्मी, ज़रूर आना, तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लग रहा।

Wednesday, 5 March 2008

पार्डन माई ब्रोकेन इंग्लिश

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स, जॉर्जेज़ हेनरी नाम के इलाक़े का एक चौराहा, चौराहे के एक कोने पर खड़ा मैं, दाईं तरफ़ है मीरोड नाम का मेट्रो स्टेशन, बाईं तरफ़ ट्राम का स्टॉप। सामने एक दूकान के ऊपर लगी इलेक्ट्रोनिक घड़ी, सात बजे शाम का समय दिखाने के साथ-साथ तापमान भी बता रही है -1.5 डिग्री...मतलब ठंड कड़ाके की है।

मैं जेब में हाथ डाले इधर-उधर देख रहा हूँ, समय काट रहा हूँ। पत्नी बगल में एक ब्यूटी पार्लर में बाल बनवाने गई है। अंदर भी बैठा जा सकता था, लेकिन ज़िंदगी में आजतक कभी लेडिज़ तो क्या, सैलून छोड़कर किसी जेंट्स ब्यूटी पार्लर में भी क़दम नहीं रखा, जहाँ सुना है बाल कटवाने के अलावा भी कई और उपायों से लड़कों की सुंदरता को सँवारा जाता है। भय कहें, संकोच कहें, भीतर नहीं जा सका। बाहर ठंड में ठिठुरता टहलक़दमी करता रहा।

कुछ पल बीते होंगे, देखा ट्राम स्टेशन पर दो लड़कियाँ खड़ी हैं, गोरी, आपस में बातें कर रही हैं, मेरी ओर भी देख रही हैं। कुछ पल और बीते, देखा दोनों मेरी तरफ़ आ रही हैं, मुस्कुराते हुए। दिल बल्लियों उछला कि नहीं इसका मुझे भान नहीं, मगर इतना अवश्य था कि समयकाटू अवस्था में ज़रा रोमांच ज़रूर अनुभव होने लगा। समयकाटू अवस्था कुछ ऐसी थी कि सभी ओर देख-दाख लेने के बाद भी कुछ देखने लायक ना बचा, तो दूकान के ऊपर लगी घड़ी को ही बार-बार देख रहा था। तापमान कभी -1 तो कभी -1.5 होता जाता था। कभी सात, सवा सात बना जाता, तो कभी सात बीस।

और दोनों लड़कियाँ आ ही गईं। मगर साहब...कहानी यहीं समाप्त। जो वो मुझसे कहें, वो मेरे पल्ले ना पड़े, और मैं जो अँग्रेज़ी बोलूँ, वो उन्हें ना समझ आए। मेरे रोमांच का अंत कुछ ऐसा हुआ - गोरियाँ जैसे मुस्कुराते आई थीं, वैसे ही चली गईं। मैं हक्का-बक्का खड़ा रहा।

फिर एक ट्राम आई, दोनों उसपर बैठीं, ट्राम चल पड़ी। दोनों ने जाते-जाते मेरी ओर देखा या नहीं पता नहीं, मगर मैंने देखा। और जब देखा तो वो मेरी ओर नहीं देख रही थीं।

दोनों चली गईं, एक पहेली छोड़कर। मुझसे ट्रेन की लाईन के बारे में पूछ रही थीं? ट्राम का नंबर जानना चाहती थीं? कोई पता पूछ रही थीं?या कोई मदद माँग रही थीं? - मुझे कुछ पता ही नहीं चला कि वो आख़िर आई क्यों थीं मेरे पास।

और ये स्थिति इसलिए थी क्योंकि मुझे उनकी भाषा - फ्रेंच और फ़्लेमिश - नहीं आती थी, और उनको अँग्रेज़ी नहीं आती थी। गोरे होने के बावजूद अँग्रेज़ी नहीं आती थी।

बेल्जियम में ऐसे कई क्षण आए, जब भाषाई उलझन पेश आई। अँग्रेज़ी की अल्प समझ होने के बावजूद, अक्सर ऐसा हुआ कि, अँग्रेज़ी भाषाई पुल की भूमिका निभाने में नाकाम रही। ये अगर भारत के किसी क़स्बे-मोहल्ले की बात होती तो आश्चर्य नहीं होता, लेकिन ये तो गोरों का देश था। गोरों को अँग्रेज़ी नहीं आती - मुझे ज़रूर आश्चर्य हुआ, क्योंकि भूरे अँग्रेज़ों के साए से प्रभावित और आक्रांत भारत में समझ तो ऐसी ही हो गई है, कि गोरा मतलब अँग्रेज़। मगर गोरा होना और अँग्रेज़ होना - दोनों अलग-अलग बातें हैं, ये बात बेल्जियम के अँग्रेज़ी ना जाननेवाले गोरे-गोरियों के संपर्क में आने के बाद ही समझ में आई।

अब मुझ जैसे प्राणी को आश्चर्य भले हो रहा हो, लेकिन गोरों के लिए ये कोई आश्चर्य की बात नहीं। यूरोप में, ब्रिटेन से बाहर निकल जाएँ, तो चाहे बेल्जियम हो, या फ़्रांस, या इटली, या स्पेन, वहाँ ऐसे गोरे-गोरियों की भरमार होगी, जिन्हें अँग्रेज़ी नहीं आती। लेकिन इससे क्या कोई फ़र्क़ पड़ता है? नहीं। वहाँ रहनेवाले आराम से अपनी ज़िंदगी बिता रहे हैं। उनके लिए उनके देश की भाषा ही सबकुछ है, उससे अधिक की उन्हें ना लालसा है, ना ज़रूरत।

मगर कल्पना कीजिए कि अपने भारत में, कम-से-कम देश की राजधानी में, कनॉट प्लेस के किसी मेट्रो स्टेशन पर, कम-से-कम उन दो गोरियों की सरीखी उम्र के युवाओं के बीच, क्या आज कोई ऐसा सोच सकता है, कि अँग्रेज़ी के बिना ज़िंदगी आराम से बीत जाए? जो जानता है, वो चौड़े होकर टहलता है। जो नहीं जानता, उसके दिल में ये खटका ज़रूर लगा रहता है कि हिंदी-बांग्ला-तमिल-गुजराती ठीक है, मगर अँग्रेज़ी भी आ जाती तो दुनिया जीत लेते। मैक्डॉनल्ड में खाना हो, या किंगफ़िशर की फ़्लाइट पर चढ़ना हो - अँग्रेज़ी जानने से कॉन्फ़िडेंस रहता है। और ना जानने से अक्सर नहीं रहता है।

भारत में अँग्रेज़ी संवाद की नहीं, अकड़ की भाषा बन चुकी है। मोबाईल फ़ोन कंपनी के किसी कर्मचारी से बातचीत करनी हो, एयरपोर्ट पर टिकट ख़रीदना हो-चेक इन करना हो-एयरहोस्टेस को बुलाना हो , मल्टीप्लेक्स सिनेमा में टिकट-कोल्ड ड्रिंक्स लेना हो, या फिर टाइटन-आर्चीज़-मैक्डॉनल्ड्स-वूडलैंड्स-शाहनाज़ ब्यूटी पार्लर जैसी चमचमाती दूकानों में पाँव रखना हो - क्या ये एहसास नहीं होता कि जो अँग्रेज़ीदां तबक़ा है, उस क्लब का ग्राहक सम्मान भी पाता है, सहूलियत भी।

और ये भेद-भाव केवल ज़ुबान तक ही सीमित नहीं रहता, अँग्रेज़ियत आपके पहनावे, चाल-ढाल से भी दिखनी आवश्यक है। बल्कि वो शायद अधिक आवश्यक है क्योंकि जहाँ अटके, वहाँ - लाइक-आई मीन-यू नो - जैसे बैसाखीरूपी शब्दों के सहारे अँग्रेज़ी ज्ञान बघारने की बेशर्म कोशिश करते, लेकिन जींस पहने-जेल लगाए किसी ग्राहक की अँग्रेज़ी, अँग्रेज़ी बोलने की कोशिश करते उस ग्राहक की अँग्रेज़ी से बेहतर समझी जाती है, जो टेरीकॉटन पैंट पहने-तेल लगाए आता है लेकिन बस शुगर को सूगर बोल जाने के कारण शर्मा जाता है। बात अगर केवल अँग्रेज़ी ज्ञान की होती तो जींसधारी को भी अपनी अल्पज्ञता पर वैसी है शर्म आती जितनी कि टेरीकॉटन पैंटधारी को। लेकिन बेशर्मी शर्म पर हावी रहा करती है।

और ये सब हुआ है इसलिए क्योंकि भारत ने गोरों को तो देखा, लेकिन उन गोरों को कभी नहीं देखा, जिन्हें अँग्रेज़ी नहीं आती। लेकिन क्या अँग्रेज़ी जाननेवाले गोरों और अँग्रेज़ी नहीं जाननेवाले गोरों में कोई अंतर है? नहीं है। दोनों अपनी-अपनी दुनिया के मालिक हैं। बेल्जियम-फ्रांस-जर्मनी-इटली-स्पेन-नॉर्वे-फ़िनलैंड-डेनमार्क-रूस के निवासी किसी भी कीमत पर ब्रिटेन-अमरीका-कनाडा-ऑस्ट्रेलिया से हीन या कमतर नहीं हैं। अँग्रेज़ी नहीं जाननेवाले गोरे, ना ये सोचकर मन मारे रहते हैं कि उन्हें अँग्रेज़ी नहीं आती, और ना अँग्रेज़ी जाननेवाले गोरे, ये सोचकर कि उनको अँग्रेज़ी आती है, इठलाते फिरते हैं। दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। भारत में ये बड़प्पन नहीं दिखाई देता।

यूरोप की राजधानी कहे जा सकनेवाले ब्रसेल्स में ही टहलते हुए एक दिन मैं और मेरी पत्नी भटक गए। मेरी पत्नी ने फ़्रेंच के कुछ वाक्य सीख रहे थे, उन टूटे-फूटे वाक्यों के सहारे उसने फ़ुटपाथ पर जैकेट-टोपी-मफ़लर में लिपटे एक पढ़े-लिखे से लग रहे बुज़ुर्ग से संवाद स्थापित किया। पहले फ़्रेंच, फिर अँग्रेज़ी में कुछ वाक्यों के सहारे उस बुज़ुर्ग ने, एक चौराहे पर जाकर हमें रास्ता दिखा दिया।

चलते समय मेरी पत्नी ने उसे - "मेसी" - फ़्रेंच में धन्यवाद देते हुए कहा - "पार्डन माई ब्रोकेन फ्रेंच।"

जवाब में उस बुज़ुर्ग ने भी कहा - "पार्डन माई ब्रोकेन इंग्लिश।"

क्या भारत में 'प्रॉपर इंग्लिश' बोलनेवाले और 'ब्रोकेन इंग्लिश' बोलनेवाले, किसी चौराहे पर एक साथ, बिना किसी हीन-भावना के-बिना किसी श्रेष्ठ भावना के, पूरे आत्मविश्वास के साथ, अपनी-अपनी राह पकड़, उसपर नहीं चलते रह सकते। बिना इठलाए, बिना हिचकिचाए। थोड़ी बहुत अँग्रेज़ी तो सबको आती ही है ना? ये वाक्य तो आपने भी सुना ही होगा अपने आस-पास, कभी-ना-कभी - "जानते तो हैं यार, मगर बोल नहीं पाते, हिचकिचाहट होती है।"

क्या साहबों की भाषा सीखकर बड़ा साहब दिखने की कोशिश ही इस नक़ल का अंत है? बड़प्पन की नक़ल क्यों नहीं हो रही?

Friday, 1 February 2008

क्या मुस्कुराना भूल गया बिहार?

अँग्रेज़ी के महानतम लेखक शेक्सपियर के जन्मस्थान- ‘स्ट्रैटफ़र्ड-अपॉन-एवन’- से एक फ्रिज मैगनेट लेकर आया था जिसपर शेक्सपियर के नाटक ‘ट्वेल्फ़्थ नाइट’ की एक उक्ति लिखी थी – बेटर ए विटी फ़ूल दैन ए फ़ूलिश विट – समझदारी से की गई मूर्खता, मूर्खता से समझदारी दिखाने से बेहतर है।

इसी उक्ति पर पटना में अपने भाई के साथ चर्चा हो रही थी, मैंने कुछ मिनटों तक भाई को उस दिलचस्प उक्ति के बारे में समझाने की कोशिश की। वो बिल्कुल समझ गया, और कहा – एतना घुमाके बोलने का क्या ज़रूरत है, सीधे बोलिए ना भाई कि - ‘क़ाबिल’ नहीं बनना चाहिए!

गागर में सागर भरनेवाली ऐसी कितनी ही विशुद्ध बिहारी उक्तियों के रसास्वाद के लिए तरसते हैं विदेशों में बसे बिहारी।

ब्रिटेन में बिहारियों की संख्या कितनी है – बताना मुश्किल है। कोई जुगाड़ बैठाकर, गणित-विज्ञान आदि का सहारा लेकर अंदाज़ा लगाया जाए, इसमें भी कई पेचीदगियाँ हैं। फिर भी मोटा-मोटी बात की जाए तो चार चीज़ों से अंदाज़ा लग सकता है।

पहली बात ये कि अंतिम जनगणना के हिसाब से ब्रिटेन में बाहर के देशों से आकर बसे लोगों में आधे से अधिक एशियाई हैं। दूसरी कि इनमें सबसे अधिक संख्या है भारतीयों की, जो कोई साढ़े दस लाख है और जो ब्रिटेन की कुल आबादी का 1.8 प्रतिशत हिस्सा है। वैसे इनमें शुद्ध भारतीय नागरिकों की संख्या कम ही होगी, भारतीय मूल के लोग अधिक हैं। तीसरी बात ये कि इन भारतीयों में सबसे अधिक संख्या है गुजरातियों की, उनकी संख्या है साढ़े छह लाख। और चौथी बात ये कि जो बाक़ी बचे साढ़े चार लाख भारतीय हैं उनमें भी पंजाबियों की संख्या सर्वाधिक है। इसप्रकार बाद बाक़ी जो संख्या बचती होगी उसमें ही बिहारियों का अस्तित्व समाहित होगा।

ख़ैर उबाऊ आँकड़ों को परे रख सपाट भाषा में ब्रिटेन के बिहारी समुदाय को, अल्पसंख्यकों में भी अल्पसंख्यक कहा जाए तो इसमें कोई ग़लती नहीं होगी।

पंजाब यहाँ आए दिन एशियाई बहुल इलाक़ों में किसी बीएमडब्ल्यू-मर्सीडिज गाड़ी के साउंड सिस्टम से निकलते अस्थिकंपक संगीत के रूप में दिख जाएगा; गुजरात यहाँ किसी भी जेनरल स्टोर के काउंटर पर खड़े विनम्र दूकानदार की मुस्कुराहट में मिल जाएगा; ब्रिक लेन नामक इलाक़े में रोहू और इलिश माछ की सुगंध के साथ बंगाल भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा लेगा और ईस्ट हैम जैसे इलाक़ों में सुपरस्टार रजनीकांत की फ़िल्मों के पोस्टरों के रूप में दक्षिण भारत का चेहरा भी दिख जाएगा; लेकिन बिहार उसी तरह ढूँढे नहीं मिलेगा जिसतरह यूपी,एमपी या ऐसे अन्य प्रदेशों का अस्तित्व।

वैसे बिहारियों की कमज़ोर उपस्थिति में अस्वाभाविक कुछ नहीं है क्योंकि गुजराती और पंजाबी समुदाय के लोगों का थोक संख्या में बाहर निकलना ब्रितानी राज के दौरान ही शुरू हो चुका था। तो पुराने वटवृक्ष से निकली शाखाओं से वटवंश का प्रसार तो होगा ही।

बिहार के लोग अभी बाहर निकल ज़रूर रहे हैं, लेकिन ज़्यादातर प्रवासी अभी प्रोफ़ेशनल हैं, पहली पीढ़ी के हैं, जिनकी दुनिया दफ़्तर में गिनती के सहकर्मियों और घर पर एकाध सदस्यों के बीच बतियाने तक सिमटी है। घर का असल मतलब तो उनके लिए अभी भी वही बिहार है, वही मोहल्ला, वही गलियाँ, वही सड़कें, वही माटी, जिनके आशीष या श्राप से वे सात समुंदर पार पहुँचे। देसी भाषा में, पहली पीढ़ी के बिहारी प्रवासियों में बिहार के लिए एक ‘टान’ ज़रूर बसता है।

बिहार से छुट्टियों के बाद लौटनेवाले हर बिहारी से अपेक्षा होती है कि वह साथी बिहारियों के लिए अनुभवों-क़िस्सों की मोटरी लेकर आएगा। नीतिश राज में कुछ बदला कि नहीं, क्राइम घटा कि नहीं, बिजली रहती है कि नहीं, ऐसी आम उत्कंठाओं को शांत करने के बाद बोनस जानकारियाँ दी जाती हैं; कि अब पटना में भी पित्ज़ा-बर्गर वाली फ़ास्ट-फ़ूड दूकानें खुल चुकी हैं, जहाँ जींसधारी बालाएँ दिल्ली-बंबई को टक्कर देती नज़र आती हैं; कि अब पटना में भी रेडियो मिर्ची पहुँच चुका है, आदि-इत्यादि।

लेकिन यात्रा-वृत्तांत बिना हास्यरसास्वाद के समाप्त नहीं होता; बेगूसराय वाले दोस्त को खोजकर बताई जाती है बात कि ज़ीरो माइल पर एक साइनबोर्ड दिखा- ‘दिलजले हेयर कटिंग सैलून’...ठहाके लगते हैं और फिर बात पुराने दिनों में लौट जाती है; बेगूसरायवासी मित्र बताता है कि छात्रावस्था के दौरान रवीना टंडन बेगूसराय में ख़ासी पॉपुलर थी, और हो सकता है उसी के किसी ‘दिलजले’ आशिक़ ने सैलून का नाम......बात ठहाकों में खो जाती है। बिहार शब्द प्रवासी बिहारियों के लिए जी को हल्का कर देनेवाली मुस्कुराहट बन जाता है।

लेकिन फिर पटना में अपने भाई की एक बात याद आती है – बाहर हो तो मज़ा आ रहा है, यहाँ रहोगे तो जिस बात पर हँसी आता है उसी पर चिल्लाओगे!

मैंने अचानक ग़ौर किया कि सचमुच वहाँ आम जनजीवन में मुस्कुराहट कम ही दिखती है। बैंक हो, सरकारी दफ़्तर हो, होटल हो, सिनेमाघर हो, ऑटो हो, रिक्शा हो – मुस्कुराते चेहरे कम ही दिख रहे हैं। कहीं तनाव दिखता है, कहीं विषाद, कहीं रोष, कहीं अहंकार, कहीं क्रोध, कहीं झल्लाहट। मुस्कुराकर बात करो तो भी कोई नहीं मुस्कुराता। जान-पहचान के बाहर ऐसा एक भी व्यक्ति याद नहीं पड़ता जिसने मुस्कुराकर बात की हो।

तो क्या वाकई सात समुंदर पार बैठे बिहारियों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरनेवाला बिहार मुस्कुराना भूल गया है, या मेरी ही नज़र धोखा खा गई।

(ये लेख पिछले वर्ष 'प्रभात ख़बर' के बिहार विशेषांक में छपा था। अगले सप्ताह पटना जा रहा हूँ, इस उम्मीद के साथ कि भगवान करे सचमुच ही मेरी नज़र एक साल पहले धोखा खा गई हो)