Tuesday 25 November 2008

दिख रही है बदलाव की बयार

लंदन में बीयर की गिलास थामे गोरों के साथ कॉरपोरेटिआए अंदाज़ में बतियाते कॉन्फ़ि़डेन्ट देसी नौजवानों का दिखना सामान्य सी बात है।

लंदन में गोरियों के साथ लटपटाए ओवरकॉन्फ़िडेन्ट देसी नौजवानों का दिखना या गोरों के साथ खिखियाती देसी नवयुवतियों का दिखना भी सामान्य सी बात है।

लंदन में हेलो-थैंक्यू-नो प्रॉब्लेम टाइप के शब्दों से सज्जित ठेठ देसी अंग्रेज़ी में हैटधारी गोरे साहबों के साथ पिटपिटाते नॉन-कॉन्फ़ि़डेन्ट देसी भद्रजनों का दिखना भी एक सामान्य बात है।

लेकिन ऐसे देसी युवक-युवतियाँ-भद्रजन जिनके साथ बतिया रहे हैं, या लटपटा रहे हैं, उस किरदार का रंग गोरा ना होकर काला हो तो ये बात थोड़ी असामान्य होगी।

पता नहीं कद-काठी का भय है, या संस्कृति के अंतर से उपजा विलगाव, या भीतर कहीं समाया रंगभेद या फिर गोरे रंग के लिए जीन में दबा पड़ा दासता का भाव - ब्रिटेन में काले लोगों से भारतीयों की बहुत नहीं बनती - ये बात काले भी समझते हैं, भारतीय भी।

भारतीयों को दिखाई देता है कि झाड़ू लगाने, कचरा उठाने, टॉयलेट साफ़ करने, पहरेदारी करने जैसे ग़ैर-तकनीकी कामों में जितनी संख्या में काले हैं उतने दूसरे नहीं।

दफ़्तरों में कहीं कोई काला नहीं दिखता जो किसी बड़ी ज़िम्मेदारी वाले पद पर बैठा हो, जेनरल स्टोर्स में भी काउंटर पर अपने गुज्जू-पंजाबी दिखाई देते हैं या तमिल-बांग्लादेशी।

कुल मिलाकर जिस मोटे तरह से कहा जा सकता है कि भारतीय क्या काम करते हैं, या पाकिस्तानी-बांग्लादेशी क्या काम करते हैं, या तमिल-सिंहला, या गोरे, उस मोटे तौर से कहना बड़ा मुश्किल है कि काले लोग क्या काम करते हैं।

दूसरी तरफ़ मार-धाड़-ख़ून-ख़राबे की घटनाओं के साथ काले लोगों की छवि वैसे ही जुड़ी है जिस तरह से भारत में बम धमाकों के साथ मुसलमानो की छवि।

फिर कमर और घुटनो के बीच जाँघ के किसी हिस्से पर पैंट लटकाकर रंग-बिरंगे अंडरवियरों की प्रदर्शनी करने की कला के कारण भी काले भारतीयों की निगाहों में कलंकित होते रहते हैं।

और भारतीयों को तेल में सीझे और सने खाने की दूकानों के अस्वास्थ्यकर व्यंजनों का उपभोग करते जिसतरह से काले दिखाई देते हैं उसतरह से दूसरे नहीं दिखाई देते।

और पढ़ाई-लिखाई का मामला हो, तो हर बार अख़बार में कोई ना कोई भारतीय चेहरा दिख जाएगा मैट्रिक-इंटर(जीसीएसई-ए लेवल) की परीक्षाओं के टॉपरों की सूची में, मगर काले छात्र-छात्राओं के चेहरे दिखें, इस बात की संभावना कम ही रहती है।

ट्रेनों में भी जिस तरह से गोरे साहब-मेम या अपने देसी लोग अख़बार-मैग्ज़ीन-किताब पढ़ते नज़र आ जाते हैं, उस तरह से काले तो कभी नहीं दिखते, बहुत हुआ तो मुफ़तिया या किसी के छोड़े हुए अख़बारों को पलटते दिखाई दे जाएँगे काले पैसेंजर।

और हाँ, घूमने-घामने की जगहें हों, जहाँ पर्यटकों की भरमार हो, वहाँ भी भीड़ में नज़रें घुमाने पर गोरे दिखते हैं, चीनी-जापानी दिखते हैं, भारतीय दिखते हैं, मगर कालों का दिखना दुर्लभ ही होता है।

मिला-जुलाकर भारतीयों के मन में काले लोगों की एक सामान्य छवि यही बनती है कि काले लोग पिछड़े हैं, गोरों या भारतीयों की तरह सभ्य नहीं, गोरों और भारतीयों की तरह संपन्न नहीं।

पर पिछले एक हफ़्ते में दो दिन ऐसे आए जब लगा कि कहीं कुछ बदल रहा है शायद।

पहली घटना - रात का समय, मैं दफ़्तर से घर जा रहा हूँ, ट्रेन में इक्के-दुक्के लोग बैठे हैं, सामने की सीट पर एक काला व्यक्ति बैठा है, 40 के आस-पास की उम्र है, वो एक किताब पढ़ रहा है, पूरी तन्मयता के साथ, तमाम स्टेशन आए, वो पढ़ता ही रहा, फिर एक स्टेशन पर उसने किताब बंद की, बाहर निकला, ट्रेन चल पड़ी, मैंने खिड़की से देखा, वो किताब पढ़ते-पढ़ते ही प्लेटफॉर्म पर बाहर के दरवाज़े की ओर बढ़ रहा है।

दूसरी घटना - दिन का समय, मैं घर से दफ़्तर जा रहा हूँ, प्लेटफ़ॉर्म पर थोड़ी भीड़ है, ट्रेन सात-आठ मिनट बाद आएगी, बगल में खड़ा एक काला व्यक्ति एक किताब पढ़ रहा है, तन्मयता के साथ, लोग आ रहे हैं-जा रहे हैं, वो किताब पढ़े जा रहा है, ट्रेन आ रही है, वो तब तक पढ़ना बंद नहीं करता जब तक ट्रेन बिल्कुल रूक नहीं जाती, वो ट्रेन के भीतर जाता है, फिर से पढ़ाई में जुट जाता है।

दोनों कालों के हाथ में जो किताब थी, उसका शीर्षक था -"ड्रीम्स फ़्रॉम माई फ़ादर Dreams From My Father" - एक आत्मकथात्मक संस्मरण, उस व्यक्ति का, जो नए साल के पहले महीने की 20 तारीख़ से वाशिंगटन के व्हाइट हाउस में डेरा डालने जा रहा है।

पाँच नवंबर को उसकी जीत को चहुँओर बदलाव का नाम दिया गया। अमरीका से उठी बदलाव की वो बयार लंदन में बहती दिखाई दे रही है, निश्चित ही दूसरी जगहों पर भी बह रही होगी।

Friday 14 November 2008

पर्दे पर चाय-पानी पिलानेवाले वे बच्चे

"शाहरूख़ ख़ान - म्च्च, दम है बॉस, मैं तो बस स्वदेस के उस एक सीन के बाद से ही उसका..."

"कौन सा? वो बच्चे वाला? जब वो ट्रेन से जा रहा है?"

जवाब हाँ ही है जो सुनाई नहीं, दिखाई देता है - सिर दाएँ-बाएँ हिलता है, आँखें चौड़ी हो जाती हैं, कुछ इस भाव से मानो मोहन भार्गव को पानी का कुल्हड़ थमाते उस बच्चे का वो दृश्य साकार हो उठा हो। सिर मेरे मित्र का था, आँखें भी उसी की थीं।

स्वदेस अधिकतर लोगों ने तो देखी ही होगी, और लंदन-अमरीका-कनाडा के भारतीयों और भारतवंशियों ने तो कर्तव्यभाव से देखी होगी।

दृश्य सचमुच सुंदर है - संवेदनशीलता जगाउ।

फिर एक और फ़िल्म आती है - तारे ज़मीन पर। उसका भी एक दृश्य है, आमिर ख़ान किसी ढाबे पर बैठे हैं, बच्चा चाय लेकर आ रहा है, और फिर अगले दृश्य में रामशंकर निकुंभ के साथ बैठकर चाय में बिस्कुट बोरकर खा रहा है।

एक और संवेदनशीलता जगाउ सीन। कईयों के लिए नैन-भिगाउ सीन।

मगर सिनेमाई दुनिया से बाहर आते ही संवेदनशीलता का ये स्विच सीधे ऑफ़ हो जाता है।

चाय-पानी पिलानेवाले किसी बच्चे को देखकर आँसू आते हैं? चलिए शुरूआत मैं ही करता हूँ - मेरी आँखों से नहीं आते।

बाल श्रम की बहस बेमानी है क्योंकि तमाम चीख-चिल्लाहट के बावजूद बाल-श्रम अभी ख़त्म तो हुआ नहीं? ख़तम हो जाता तो स्वदेस और तारे ज़मीन पर के नैन-भिगाउ सीन कहाँ से आते?

किसी अंग्रेज़ी फ़िल्म में कभी किसी बच्चे को चाय-पानी पिलाते देखा है?

नहीं ना? तो फिर बाल-श्रम जब ख़त्म होगा तब होगा। अभी वो है, हर दिन दिखता है, हर तरफ़ दिखता है - चाय-पानी पिलाते हुए, रेल पटरियों पर कूड़ा बटोरते हुए, सभ्य घरों में बर्तन और फ़र्श चमकाते हुए।

क्यों नहीं आँखें भीजतीं इन बच्चों को देखकर? और हाँ ये बच्चे कोई - यादों की बारात - के कानों तक बाल बढ़ाए जूनिर आमिर ख़ान जैसे बच्चे नहीं हैं, जिनका पर्दे के बच्चों से कोई मेल ही ना हो। ये बच्चे तो स्वदेस और तारे ज़मीन पर के रियलिस्टिक बच्चे लगते हैं।

क्यों नहीं ऑन होता संवेदनशीलता का स्विच इन रियललाइफ़ बच्चों को देखकर?

जब सिनेमा का आविष्कार हुआ तो मैक्सिम गोर्की ने कहा था - "आज का मानव अपने दैनन्दिन जीवन की सामान्य घटनाओं से विशेष उद्दीपन महसूस नहीं करता। मगर इन्हीं घटनाओं की जब नाटकीय प्रस्तुति होती है तो उससे वही मानव हिल जाता है। मुझे भय है कि एक दिन चलचित्र की ये दुनिया, वास्तविक दुनिया पर भारी पड़ेगी और मानव के मन-मस्तिष्क पर अधिकार कर लेगी।"

कोई सौ साल पहले का गोर्की का भय सही था ना?

Thursday 13 November 2008

एक लेखकाना शाम

शाम हो रही है, जिस काम के लिए पाउंडरूपी पैसे मिलते हैं, वो काम ख़त्म है, ऑफ़िसिआए माहौल में कंप्यूटर के अमूर्त स्क्रीन या किसी ललना के मूर्त नैन निहारने, या फिर ईश्वरप्रदत्त बोलने-सुनने की सुविधा के सहारे परनिंदा-परचर्चा का सुख लेने की उमर रही नहीं - सो बिल्कुल समय पर उस दफ़्तर से स्वयँ को बाहर ढकेल लिया।

नवंबर है, हवा तेज़ है, सर्द है, लेकिन मन में ना जाने कहाँ से गुलज़ार की मीठी धूप वाला ख़याल आ गया, ठंड मीठी लगने लगी - समझ गया, आज दिल लेखकाना हो रहा है।

परिभाषानुसार और परंपरानुसार लेखकों की फ़ितरत भीड़ से अलग होनी चाहिए, तो भीड़ जहाँ दफ़्तर से चार क़दम दूर बसे रेलवे स्टेशन में घुसी जा रही थी, मुझमें समाए लेखक ने मुझे चार किलोमीटर दूर एक दूसरे रेलवे स्टेशन की ओर मोड़ दिया - होठों पर गुनगुनाहट, आँखों में ऑब्ज़र्वेशन, मस्तिष्क में सोच और आत्मा में लेखक को बसाए हम चल पड़े भीड़ से अलग, एक लेखकीय सफ़र पर।

स्टेशन आ गया, शाम का समय है, दफ़्तर छूटने का समय, कर्मरत प्राणी उस दिन के कर्म के संपादन के बाद रेलगाड़ियों की ओर भागे जा रहे है, डेली पैसेंजर्स गाड़ी किस प्लेटफ़ॉर्म पर लगी है ये पढ़ने के लिए भी नहीं रूकते, चलते-चलते ही स्क्रीन पढ़ लेते हैं, जो धुरंधर हैं वे भीड़ में भी आड़े-तिरछे होकर उसी कौशल से सरसराते आगे बढ़े जा रहे हैं जिसतरह पटना के बाकरगंज रोड पर लगे जाम के दौरान दो चक्कों वाले वाहनों के सवार तीन-चार चक्कों पर लदी सवारियों से आगे निकल जाते हैं।

अधिकतर लोगों के हाथ में शाम में बँटनेवाले मुफ़तिया अख़बार हैं, जिनमें एक-दो ख़बरें पढ़ने को और दसियों देखने को मिल जाती हैं, कोई उनको देखते-देखते चल रहा है तो कोई चलते-चलते उनको देख रहा है...और उस शाम को कुलबुलाया एक लेखक चल भी रहा है और देख भी रहा है - भीड़ की तरह अख़बार को नहीं, अख़बार थामी भीड़ को।

कोई भागनेवालों की निगाह में धीमे चल रहा है, तो कोई धीमे चलनेवालों की निगाह में भाग रहा है, लेकिन भीड़ ट्रेन की ओर बढ़ी जा रही है, उसमें वेग है, गति भी और दिशा भी।

मगर इस वेग के बीच एक जगह कुछ ठहरा हुआ दिखाई दे रहा है, भीड़ आगे जाकर थोड़ा दाएँ-बाएँ ख़िसक रही है, फिर वेगवान हो जा रही है।

थोड़ा समीप जाता हूँ, देखता हूँ, एक विकलांग है, आगे बढ़ रहा है, ठहर जा रहा है, उसका संतुलन नहीं बन पा रहा।

और आगे जाता हूँ, वो केवल शारीरिक विकलांग ही नहीं, दिमाग़ी तौर पर भी विकलांग है, कभी इधर देख रहा है, कभी उधर देख रहा है, मगर समझ में नहीं आ रहा, क्या देख रहा है, साथ कोई नहीं है।

मैं एक पल उसे देखता हूँ, सामने लगी घड़ी देखता हूँ, प्लेटफ़ॉर्म देखता हूँ, वहाँ खड़ी ट्रेन देखता हूँ, उसकी ओर लपकती भीड़ देखता हूँ, एक बार फिर घड़ी देखता हूँ - और सात मिनट बचे हैं ट्रेन के छूटने में।

मगर आज तो मैं भीड़ का हिस्सा नहीं, जो सब करेंगे वो नहीं करना है, उसपर से सामने चारों ओर छितराए वैभव, आधुनिकता, विकास और सुंदरता को चुनौती देनेवाला एक कैरेक्टर खड़ा है, सभ्यजन क्या करते हैं, इसे देखने का इतना बड़ा अवसर क्या हाथ से जाने दिया जा सकता है - सामान्य दिन होता तो बात अलग थी, आज तो मेरे भीतर लेखक समाया था, उसने आगे बढ़ने से रोक दिया - ट्रेन जाती है तो जाए, आधे-एक घंटे देर ही होगी ना, अगली ट्रेन से ही सही।

मैं और मेरे भीतर समाया लेखक एक कोने में दीवार से सट गए, ऐसे जहाँ से विकलांग दिखाई भी दे, और भीड़ का रास्ता भी ना रूके।

भीड़निर्माता एक के बाद एक करते बढ़ रहे हैं, विकलांग भी बढ़ रहा है, रूक रहा है, लेकिन भीड़ का कोई भी अंश रूकना तो दूर ठिठक भी नहीं रहा। एक क्षण मेरे भीतर भी कर्तव्यबोध की टीस उठती है, कि लेखकीय चोले को त्याग उस विकलांग की सहायता की जाए, लेकिन एक तो कमज़ोर इच्छाशक्ति, दूसरा लेखकीय उत्कंठा - कि भीड़ क्या करती है, ये सोचकर मैं जहाँ हूँ वहीं बना हूँ।

विकलांग अचानक रूकता है, इस बार उसके ठीक बगल में एक भारतीय साहब खड़े हैं जिन्हें मैं देख रहा हूँ कि बड़ी देर से खड़े हैं, चेहरे पर अतिगंभीर भाव लिए, कभी अख़बार पलट रहे हैं, कभी टीवी स्क्रीन पर ट्रेनों की समयसारिणी देख रहे हैं, मगर पीछे नही् देख रहे जहाँ से विकलांग आ रहा था और अब उनके ठीक बगल में इधर-उधर सिर घुमाता, मुँह हिलाता खड़ा है।

भारतीय साहब ने नैनों के दृष्टि क्षेत्र के विस्तार में विकलांग को देखा, फिर इधर देखा-उधर देखने लगे और पन्ने पलटने लगे।

प्लेटफ़ॉर्म के ठीक गेट के पास खड़ी एक काली युवती भी बार-बार पीछे की ओर देख रही है, चेहरे पर दया है उसके, लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि वो उस विकलांग को देखने के लिए पीछे मुड़ रही है और इस कारण द्रवित है, या किसी और को देखने के लिए पीछे मुड़ रही है और उसका चेहरा ही करूणामय है।

वो फ़ोन निकालती है, किसी से बात करती है, क्या कहती है पता नहीं, लेकिन फिर वो ट्रेन की ओर बढ़ जाती है। मतलब लगता तो यही है कि वो उस विकलांग को नहीं देख रही थी। मतलब ये भी कि जिनका चेहरा करूणामय हो, वो सचमुच करूण हों, ये ज़रूरी नहीं।

प्लेटफ़ॉर्म से पहले लगे गेट के पास नेवी ब्लू पैंट, स्काई ब्लू कोट और स्काई ब्लू टोपी लगाए, एक रेलवे कर्मचारी भी तो खड़ा है, वो क्यों नहीं कोई मदद कर रहा है उस विकलांग की। देख तो रहा है वो उसकी ओर? लेकिन हो सकता है पहले भी ऐसी स्थिति से पाला पड़ा हो उसका, क्योंकि चेहरा तो अनुभव से तपा हुआ लगता है उसका। ख़ैर वो जहाँ है वही हैं, मैं भी जहाँ हूँ वहीं हूँ। इस बीच वो भारतीय महाशय ट्रेन की ओर बढ़ चुके हैं, शायद घड़ी के सात बजाने की प्रतीक्षा कर रहे थे, सात बजे के बाद जाने पर डेढ़ पाउंड की बचत हो सकती है।

आख़िर वो विकलांग टिकट खिड़की की ओर बढ़ रहा है, इसका मतलब उसे इतना अंदाज़ा तो है कि जाना किस तरफ़ है, मैं एक निगाह खिड़की के पीछे बैठे रेल कर्मचारी पर डालता हूँ जो सामान्य अँग्रेज़ लग रहा है और जो विकलांग की ओर देख भी रहा है, लगता है कि वो उस विकलांग की सहायता अवश्य करेगा।

फिर में एक निगाह घड़ी पर डालता हूँ जो कह रही है कि केवल दो मिनट रह गए हैं ट्रेन छूटने में - फिर मैं भी आगे बढ़ जाता हूँ।

स्थिति वही है जो अंतिम समय में ट्रेन में चढ़ते हुए होती है - भीड़ - मैं भीड़ में समा जाता हूँ, एक सीट के बगल में खड़ा हो जाता हूँ, कुछ ही क्षणों में पीं-पीं-पीं-पीं के साथ दरवाज़ा बंद होता है, ट्रेन चल पड़ती है।

ट्रेन में अधिकांश लोग पढ़ रहे हैं, चुपचाप, कोई मुफ़तिया बँटनेवाला अख़बार तो कोई दफ़्तर से टीपा हुआ अख़बार, कोई नोवेल थामे बैठा है तो कोई मैगज़ीन, तो कोई आईपॉड से बरसती हुई धुन में मगन है।

मैं भी अपने बैग से निकालता हूँ कुछ पन्ने - निर्मल वर्मा की एक कहानी और बाबा नागार्जुन की एक कविता - 'नया ज्ञानोदय' के नवंबर अंक में छपी है, इंटरनेट पर फ़्री है, कुछ पन्ने छाप लाया हूँ।

भीड़ भी पढ़ रही है, मैं भी पढ़ रहा हूँ - पर पता नहीं क्यों आज उस लेखकाना शाम को लिखे जानेवाले और पढ़े जानेवाले शब्दों पर संदेह-सा हो रहा है।

Wednesday 8 October 2008

उल्टा तिरंगा और एक आम आदमी

आम धारणा है कि हमारे जैसे आमजनों की औकात रत्ती भर भी नहीं होती, कहने को लोकतंत्र है, लेकिन तंत्राधीशों से पाला पड़ते ही लोकतंत्र-वोकतंत्र चला जाता है तेल लेने! लेकिन पिछले दिनों कुछ अलग हुआ, एक आम आदमी ने तंत्राधीशों के पास गुहार लगाई, और ना केवल उसकी सुनवाई हुई, बल्कि कार्रवाई भी हुई, बल्कि बदले में आभार भी मिला।

कहानी कुछ यूँ बनती है कि पिछले महीने की एक शाम आम आदमी का खाना-वाना खाकर गाना-वाना सुनने का दिल आया,चैनलबाज़ी शुरू हुई, एक चैनल पर आकर रिमोट के बटनों पर जारी एक्यूप्रेशर बंद हुआ, पर्दे पर एक चैनल आकर ठहर गया, मुफ़्त चैनल है, सो पॉपुलर है। ब्रिटेन में भारतीय चैनलों को देखने के लिए सोचना भी पड़ता है, क्योंकि इसके लिए पैसे लगते हैं, तो सोचना तो पड़ता ही है, कि चैनल हर माह आपके दस पाउंड हड़प ले, इसका हक़दार है कि नहीं।

बहरहाल जिस चैनल की चर्चा हो रही है, वहाँ गानों पर गाने चल रहे थे, कभी द्रोणा-कभी फ़ैशन-तो कभी सज्जनपुर। और फिर वही हुआ जो अक्सर होता है,शुद्ध बंबईया गानों के बीच एक अशुद्ध म्यूज़िक वीडियो की घुसपैठ! अभिषेक-अक्षय-सलमान और प्रियंका-बिपाशा-करीना के गानों के बीच ना जाने कौन लोग, कहाँ के लोग, और क्या करते हुए लोग - आते हैं, नाच-गाकर भाग जाते हैं, आम आदमी को मजबूरन झेलना पड़ता है।

तो उस रात ऐसा ही हुआ, घुसपैठ हुई। जींस-टीशर्ट पहने और उल-जुलूल बाल बनाए या बिखेरे, दो लड़कों ने गाने की कोशिश शुरू कर दी, गाने के बोल थे - "लेट्स यू-एन-आई-टी-वाई, लेट्स पी-ए-आर-टी-वाई" - यानी आओ यूनिटी करें और पार्टी करें। और ये यूनिटी किसकी? भारत और पाकिस्तान की? यूटोपियाई सोच!!!

लड़के जहाँ गा रहे थे वो कोई छोटी हॉलनुमा जगह थी, कोट-पैंट-टाई में सज्जित लोग बैठे थे, चेहरों के भाव ऐसे, मानो गीत-संगीत की महफ़िल में नहीं विश्वव्यापी आर्थिक मंदी की चर्चा के लिए बैठे हों। तो दीवार के साथ सटी कुर्सियों पर ये सज्जन बैठे थे, दीवारों पर दुनिया भर के एकता और मैत्री के राग अलापते पोस्टर और झंडे - तिरंगे,चाँद-तारे और यूनियन जैक। आगे कमर थिरकाते, गाने की कोशिश करते दो नौजवान - लेट्स यू-एन-आई-टी-वाई, लेट्स पी-ए-आर-टी-वाई!!!

तभी एक हाथ में भारत और पाकिस्तान का ध्वज लिए, कदमताल करती, छोटी स्कर्ट पहने, डांस करने को आतुर, थिरकती हुई दो बालाओं ने हॉल में प्रवेश किया...और...हा दुर्भाग्य - भारत का उल्टा तिरंगा!!!

बहरहाल उसी उल्टे तिरंगे को बाला ने पाकिस्तानी तिरंगे से यूँ छुआया जैसे राम-भरत गले मिल रहे हों।

आम आदमी को काटो तो ख़ून नहीं, इतनी भारी-भरकम जनता बैठी है, उनके सामने गाने की शूटिंग हुई, एडिटिंग हुई, चैनल से पास करवाया गया, अब एयर भी हो रहा है और किसी ने नहीं देखा! और ये तब जबकि गाने के असल हीरो भारत-पाकिस्तान हैं!!!

अगले दिन चैनल लगाया, फिर वही बेशर्म तमाशा चल रहा है। अब आम आदमी के आत्मसम्मान और आत्मगौरव का तो पता नहीं, मगर क्रोध ज़रूर जाग गया जो पिछले लंबे समय से बंबईया महफ़िलों में इन अज्ञातप्राणियों की घुसपैठ पर उबल रहा था।

आम आदमी ने भारतीय उच्चायोग की वेबसाइट खोली, वहाँ से पते जुटाए और एक ई-मेल लिखा - लंदन स्थित भारत के उच्चायुक्त को, उप-उच्चायुक्त को, ब्रिटेन के तमाम वाणिज्यिक दूतावास अधिकारियों को, सांस्कृतिक मंत्री को, हिंदी अधिकारी को और प्रेस अधिकारी को - घटना का वर्णन, चैनल का पता ठिकाना, और परिचय - एक आम भारतीय नागरिक।

ई-मेल भेज दिया गया, लेकिन उसका ना कोई लिखित जवाब आया ना ही ऑटोमेटेड जवाब...

दो सप्ताह बाद एक ई-मेल आया है भारतीय दूतावास से - "...आपको ये बताना है कि आपकी शिकायत के बाद हमने चैनलवालों से संपर्क किया, उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है और तत्काल गाने को हटा लिया है। आपने हमें इस घटना के बारे में बताया, हम इसके लिए आपके आभारी हैं..."

आम आदमी को एक पल के लिए लगा कि आम धारणा सत्य तो होती होगी ही, लेकिन उसे ध्रुवसत्य मान बैठते तो शायय ये ख़ास अनुभव ना होता।

Tuesday 7 October 2008

ब्रिटेन के आज़मगढ़ से एक डायरी

दो साल पहले, पहली बार ब्रिटेन के लीड्स शहर गया। नाम पहली बार बचपन में सुना था, क्रिकेट मैचों के दौरान, ऑल इंडिया रेडियो पर कमेंट्री सुनते समय। मगर तब लीड्स हो या लंदन, कोई अंतर नहीं पड़ता था, तब तो बस दोनों ही का नाम सुनते मन में एक ही छवि उभरती थी - क्रिकेट का हरा-भरा मैदान।

पर जब पहली बार लंदन से लीड्स पहुँचा तो दोनों ही शहरों की छवियाँ कुछ और रूप ले चुकी थीं - लंदन- जिसने बमों की मार सही और लीड्स- जिसने बम बरसानेवाले भेजे।

सात जुलाई 2005 को आतंकवाद के असुर ने लंदन पर पहली बार प्रहार किया, 50 से अधिक मासूमों को निगल गया, और ना केवल लंदन बल्कि सारे ब्रिटेन के माथे पर एक गहरा घाव छोड़ गया।

लीड्स गया था हमले की पहली बरसी पर रिपोर्टिंग करने, ये देखने कि कैसे झेल रहा है ये शहर अपने ऊपर लगे एक कलंक को, जो लगाया इसी की माटी पर खेलने-कूदनेवाले तीन युवकों ने। लंदन में तीन भूमिगत ट्रेनों और एक बस में धमाका कर मौत का तांडव रचनेवाले चार आत्मघाती हमलावरों में से तीन लीड्स के रहनेवाले थे।

लीड्स पहुँचकर पाया कि साल भर पहले लीड्स का जो मानमर्दन हुआ उसकी चोट गहरी पड़ी है। मुसलमान ही नहीं हिंदू भी परेशान हैं।

“हमने महसूस किया है कि अब यहाँ के लोग हमें ‘दूसरी’ निगाह से देखते हैं, उनके लिए तो हिंदू-मुसलमान-हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी एक ही जैसे हैं” – ये वाक्य ना जाने कितने ही लोगों को कहते पाया।

अब ये जो टिप्पणी थी,स्वयं को लाचार-बेचारा साबित करने की, वो एक क्षण के लिए स्वाभाविक लगी, कि ख़ामख़्वाह शरीफ़ लोग तंग हो रहे हैं। लेकिन जिस अंदाज़ में ये टिप्पणियाँ की जा रही थीं, उनमें एक ऐसी बात निहित थी जो इन तंग होने का दावा करते लोगों से ज़्यादा तंग करनेवाली थी। जो भी इस वाक्य का इस्तेमाल कर रहा था - कि हमारे साथ भेदभाव हो रहा है - वो बिना मुँह खोले ये प्रमाणित करना चाहता था कि वो मुसलमान नहीं है, पाकिस्तानी नहीं है, शरीफ़ है,शांतिप्रिय है। यानी - वो हिंदू है, भारतीय है।

और इसके साथ ही एक सवाल आ खड़ा हुआ - कि यदि चंद अपराधियों के कारण, कोई किसी को ‘दूसरी’ निगाह से देखता है तो इससे तो उनको भी परेशानी होनी चाहिए ना जो मुसलमान भी हैं, पाकिस्तानी भी हैं, शरीफ़ भी हैं, और शांतिप्रिय भी। वो क्या करें? भेदभाव क्या उनके साथ नहीं हो रहा?

और चलिए मान भी लिया कि ‘निगाह’ दूसरी है, तो? खोट 'दूसरी' निगाह से देखनेवाले में भी तो हो सकता है? हो सकता है, वो असहिष्णु हो, अज्ञानी हो, मूढ़ हो? और एक-दो ने 'दूसरी' निगाह से देख भी लिया तो क्या उसे सारे समाज की 'दूसरी' निगाह मान लेना ज़्यादती नहीं होगी?

मुझे लगा कि मासूम दिखने की चेष्टा करनेवाले ऐसे चतुर सज्जनों से कहूँ - कि आप ये जो स्वयं को मासूम, बल्कि दूसरों की अपेक्षा श्रेष्ठ साबित करने का उपक्रम कर रहे हैं,उसमें इस बात का पूरा ख़तरा है कि कहीं विरासत में मिले संस्कारों का ही अंतिम संस्कार ना कर बैठें।

मुझे लगा कि उन्हें झकझोरते हुए बोलूँ - कि अगर ऐसी स्थिति आन पड़े कि वाल्मीकि-वशिष्ठ जैसे मुनि-महर्षियों से लेकर स्वामी विवेकानंद-गांधी जैसे महापुरूषों के वचनों और कर्मो से सजाई और संवारी गई संस्कृति की श्रेष्ठता साबित करने का प्रयास करना पड़े, तो खेद के साथ कहना पड़ता है कि सोच में कहीं खोट है।

मुझे लगा कि उनकी आँखों में आँख डालकर बताउँ - कि श्रेष्ठ पुरूषों को श्रेष्ठ आचरण भी करना पड़ता है। और श्रेष्ठता कैसी हो? स्वामी विवेकानंद की बताई उस सीख के जैसी – सदैव कहो अपने-आप से कि तुम श्रेष्ठ हो, मगर, दूसरे को हीन समझे बिना।

पर सारी बातें मन में रह गईं, लंदन लौटना था, भूख भी लग गई थी, रास्ते में एक पब दिखा, पब की असल छवि तो मदिरालय की है, लेकिन मुझे पब का खाना बड़ा अच्छा लगता है जो जेब और स्वाद दोनों के अनुकूल होता है। तो पब में घुसा, देखा हर किसी के हाथ में जाम है - क्या गोरा-क्या काला, क्या हिंदू-क्या मुसलमान। बरबस मधुशाला की एक पंक्ति याद आई -

“मुसलमान और हिन्दू हैं वो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला;
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद-मंदिर में जाते;
बैर बढ़ाते मस्जिद-मंदिर, मेल कराती मधुशाला.”

Thursday 25 September 2008

अर्धसत्य के चप्पू चलाते हिंदू-मुसलमान

सच-झूठ-सच्चा-झूठा-सत्य-असत्य इनके बारे में बहुत सारे दोहे-मुहावरे-कहावत-सूक्तियाँ मिल जाते हैं लेकिन अर्धसत्य की बात कम होती है, बहुत हाथ-पाँव मारने पर भी केवल - अश्वत्थामा हतो वा - एक वहीं अर्धसत्य की बात दिखाई देती है।

पर क्या ये अजीब बात नहीं क्योंकि अर्धसत्य का क़द तो झूठ से भी बड़ा दिखाई देता है, अर्धसत्य को असत्य कहकर ख़ारिज़ नहीं किया जा सकता, उसका अस्तित्व मिटाया नहीं जा सकता, वो जब चाहे तब, अपनी सुविधा से ढिठाई से खड़ा हो जाता है, सबको चिढ़ाता है।

अब देखिए ना, बम फटे नहीं, चर्चों पर हमले हुए नहीं कि सबने अर्धसत्य के चप्पू थामकर अपनी नैया चलानी शुरू कर दी, चाहे हिंदू हों चाहे मुसलमान।

मुसलमान कहे फिर रहे हैं -"साहब अंधेरगर्दी की इंतिहाँ है, हमारी क़ौम से जिसे चाहे उसे पकड़ ले रहे हैं, बेचारे पढ़ाई करनेवाले लड़के हैं, अँग्रेज़ी भी बोलते हैं, और ना कोई सबूत है ना सुनवाई, लैपटॉप-एके 47 - ये सब तो पुलिस जहाँ चाहें वहाँ डाल दे, जिन बेचारों को पकड़ा, उन्हें तो धकियाकर जो चाहे उगलवा लो। और मुठभेड़ के बारे में किसे नहीं पता है - वो तो बस फ़र्जी होते हैं, कश्मीर में हो चाहे दिल्ली में।"

और जो पुलिसवाला मारा गया?

"वो तो साहब कुछ इंटरनल राइवलरी होगी, पिछले दिनों एक और नहीं मारा गया था इसी तरह, नहीं तो आप बताइए कि इतना अनुभवी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट - बिना बुलेटप्रूफ़ के चला गया!"

"और साहब बम तो हिंदू भी फोड़ रहे हैं, बदनाम केवल हमें किया जाता है। आप ही सोचिए, मालेगाँव और हैदराबाद में मस्जिद के भीतर भला कोई मुसलमान बम फोड़ेगा?"

संदेह निराधार नहीं है, उसमें हो सकता है सच्चाई भी हो - लेकिन - हो सकता है कि नहीं भी हो।

हो सकता है कि मुठभेड़ फ़र्जी ना हो, हो सकता है कि लड़के बेक़सूर ना हों, हो सकता है कि आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त अधिकतर लड़के मुसलमान हों, हो सकता है कि मस्जिदों में बम वही का़तिल फोड़ रहे हैं जो पाकिस्तान से लेकर बसरा तक की मस्जिदों में फोड़ा करते हैं, और हो सकता है कि पढ़ने-लिखने के बावजूद कुछ लोगों का दिमाग़ वैसे ही अपराध के लिए प्रेरित होता है जैसे डॉक्टर ऐमन अल ज़वाहिरी का हुआ है या पायलट की अतिकठिन पढ़ाई करने के बाद विमानों को ट्रेड टावर से टकरानेवाले युवाओं का हुआ होगा।

ऐसे में ऐसे संदेहों को क्या समझा जाए? सत्य? असत्य? या - अर्धसत्य?

अब ज़रा हिंदुओं की सुनिए - "चर्च पर हमला ग़लत है, हिंसा ग़लत है, लेकिन उसकी शुरूआत कहाँ से हुई? स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को मारा तो उनके भक्त ग़ुस्सा नहीं होंगे? और ये जो क्रिश्चन-त्रिश्चन कर रहे हैं या मुस्लिम-तुस्लिम, आज से पाँच-छह सौ साल पहले ये लोग क्या थे? पैसे और तलवार के दम पर हुआ सारा धर्म परिवर्तन।"

यहाँ भी सवालों में सच्चाई हो सकती है - मगर किसी की हत्या पर ग़ुस्सा होना सामान्य बात है तो फिर कश्मीर-पूर्वोत्तर भारत-नक्सली भारत या फिर कहीं भी, किसी के भी - चाहे आतिफ़ हो चाहे असलम - उनके मारे जाने पर भी उनके क़रीबी लोगों का ग़ुस्साना स्वाभाविक नहीं होना चाहिए? और रहा प्रलोभन और ताक़त के दम पर होनेवाले धर्म परिवर्तन का, तो वो भी सच हो सकता है, लेकिन क्या ये सच नहीं कि धर्म बदलनेवाले अधिकतर हिंदू ऐसे थे जिन्हें हिंदू समाज में सिवा हिकारत के कुछ नहीं मिला।

ऐसे में हिंदुओं ने जो सवाल उठाए उन्हें क्या समझा जाए? सत्य? असत्य? या - अर्धसत्य?

Wednesday 3 September 2008

आधे घंटे की धूप, पूरे जीवन की सीख

1986 से 1989 के बीच का कोई साल रहा होगा, एक दिन स्कूल में छुट्टी होने से एक घंटे पहले ही लंबी घंटी बजने लगी, इस अप्रत्याशित घटना से भौंचक लड़के एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे।

कुछ समझ पाते इससे पहले ही एक मास्टर साहब आए और लड़कों से हड़बड़ाते हुए कहा - चलो, सबलोग मैदान में जाकर खड़े हो जाओ जहाँ प्रार्थना होती है, फिर शिक्षक महोदय दूसरी कक्षा की ओर बढ़ गए।

लड़कों को कुछ भी पल्ले ना पड़ा लेकिन मास्टर साहब का आदेश था, वो भी आए दिन छात्रों की पीठ पर मुक्केबाज़ी का अभ्यास करनेवाले मास्टर साहब का आदेश था, लड़के बिना कोई दुस्साहस दिखाए मैदान की ओर बढ़ चले।

ज़िला स्कूल अँग्रेज़ों के ज़माने का बना था, पुरानी अँग्रेज़ी शैली की शानदार इमारत, छात्रावास, प्रिंसिपल और वाइस प्रिंसिपल का बंगला, और तीन-तीन मैदान - मुज़फ़्फ़रपुर के ज़िला स्कूल का परिसर विशाल था, कक्षा से सभास्थल तक आने में कुछ समय लगता था।

हाईस्कूल में केवल तीन ही कक्षाएँ थीं, लाइन लगाने की एक व्यवस्था थी, पहले आठवीं की लाइन, फिर नवीं और तब दसवीं के लड़कों की लाइन - हर कक्षा में पाँच सेक्शन थे - एक सेक्शन में चालीस छात्र। थोड़ी ही देर में अलग-अलग कद काठी मगर एक ही तरह के कपड़ों - सफ़ेद शर्ट और नीली पैंट पहने छह सौ छात्र मैदान में खड़े हो गए।

लड़कों में ख़ुसुर-फ़ुसुर जारी थी, लेकिन किसी को कोई अंदाज़ा नहीं था कि इस अप्रत्याशित तरीक़े से घंटी क्यों बजी और वे मैदान में बे-समय क्यों जमा हैं। सभास्थल पर एक मंच था, कोई दो-तीन फ़ीट ऊँचा, प्रार्थना के समय वहाँ प्रिंसिपल-अध्यापक खड़े रहते थे, मगर अभी वहाँ सन्नाटा छाया था, बस सामने लड़के खड़े थे।

महीना गर्मियों का था, जुलाई-अगस्त का कोई दिन, दोपहर के तीन बज रहे होंगे, सूर्यदेवता अपना पराक्रम दिखा रहे थे।

सुबह ही बारिश हुई थी, हवा में बिखरे धूलकण फ़ुहारों में धुल चुके थे, आसमान नए शीशे की तरह साफ़ हो चुका था, अदने लड़कों पर धूप मोटी बौछार की तरह बरस रही थी।

पाँच-दस मिनट तक तो लड़के खुसुर-फ़ुसुर में व्यस्त रहे, मगर इसके बाद धूप उन्हें अखरने लगी, पहले वे परेशान हुए, फिर पस्त और आख़िरकार त्राहि-त्राहि की अवस्था आ गई - आधे घंटे के बाद।

मगर लड़के अनुशासन से आतंकित थे, उन्हें पीठ पर थुलथुल मास्टर महोदय के मुक्कों की बरसात, सूर्यदेवता के कोप से अधिक भयावह लगी, वे लाइन में खड़े ही रहे।

आख़िरकार स्कूल का भवन, ख़ाली मंच, ख़ुला मैदान, किनारे खड़े पेड़, शीशे की तरफ़ साफ़ आसमान, पराक्रमी सूर्यदेवता और बेदम होते लड़के - इन सारे किरदारों के बीच एक और किरदार का पदार्पण हुआ, लड़कों में सुगबुगाहट हुई।

लड़कों ने देखा, श्वेत धोती-कुर्ते में लिपटी एक भीमकाय काया, थुलथुलाती हुई, तालमय गति से, स्कूल के भवन की ओर से उनकी ओर बढ़ी आ रही है।

लड़के क्रोधित भी थे और भयभीत भी। क्रोधित इस बात पर कि ये वही सज्जन थे जिन्होंने उनको यूँ आधे घंटे से उनको मैदान में खड़ा करवा रखा था, बिना कोई कारण बताए। और भयभीत इस बात पर कि ये वही सज्जन थे जिनके मुक्कों की बरसात प्रसिद्ध थी। भय क्रोध पर भारी रहा - लड़के यथावत् खड़े रहे।

थुलथुल काया लड़कों के पास पहुँची, चार सीढ़ियों पर उठी और फिर मंच पर खड़ी हो गई, लड़कों को निहारने लगी, चेहरे पर कोई भाव नहीं - ना ग्लानि, ना क्रोध।

अंततः उदगार फूटे - "तुम सब सोच रहे होगे कि यहाँ ऐसे तुमलोगों को क्यों खड़ा कर दिया गया है, धूप लग रही होगी, पसीना बह रहा होगा, गला सूख रहा होगा, साँस फूल रही होगी, पैर थक रहे होंगे, शरीर बेदम हो रहा होगा, अपनी असहाय अवस्था पर कभी क्रोध आ रहा होगा, कभी निराशा हो रही होगी - है ना?"

लड़के यथावत् खड़े थे, मगर मास्टर साहब की प्रभावशाली भाषा और स्पष्ट वाणी उनके कानों में सीधे उतर रही थी।

कुछ पल के मौन के बाद उदगार फिर फूटे - "अब ज़रा सोचो कि आज लाखों लोग , इस धूप में, खुले आसमान के तले, किसी छत पर, किसी छप्पड़ पर, किसी मैदान में, किसी रेलवे लाइन पर, किसी ज़मीन के टुकड़े पर, कई दिनों से भूखे-प्यासे पड़े हैं, वो कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उनके चारों ओर जलसागर है - बाढ़ में फँसे उन लाखों लोगों को कैसा लग रहा होगा?"

कुछ पल मौन रहा।

मंच से आवाज़ आई- "मैंने तुम सबको इसी कष्ट की अनुभूति कराने के लिए पिछले आधे घंटे से धूप में खड़ा रखा।"

कुछ पल फिर मौन रहा।

मंच से फिर आवाज़ आई - "अब कल तुमलोग बाढ़ प्रभावितों के लिए अपने-अपने घर से जो भी हो सकता है, खाना-पीना-पैसा-कपड़ा, लेकर आना, हम स्कूल की तरफ़ से बाढ़ में फँसे लोगों की सहायता की मदद में हाथ बँटाना चाहते हैं। अब तुमलोग क्लास में चले जाओ।"

लड़के स्तब्ध थे, जो बाढ़ आज सुबह तक उनके लिए एक शब्द था, एक समाचार भर था, - बाढ़ होती क्या होगी, इसे उन्होंने महसूस किया, जीवन में पहली बार, वो भी भयावह कष्टों का केवल एक हिस्सा भर, केवल आधे घंटे के लिए।

ज़िला स्कूल, मुज़फ़्फ़रपुर में हिंदी पढ़ानेवाले थुलथुल मास्टर साहब - राजेश्वर झा - की आधे घंटे की वो सीख उनके उन सभी मुक्कों से अधिक असरदार साबित हुई जिन्हें वे यदा-कदा अपने छात्रों की पीठ पर बरसाते रहते थे।

बिहार में आई भयानक बाढ़ के समय फिर वो आधे घंटे की धूप याद आ रही है।

Saturday 23 August 2008

अभिनव बिन्द्रा - एक समझदार अमीर?

"Wealth is the slave of a wise man. The master of a fool." ...(सेनेका- रोमन कवि, दार्शनिक, राजनीतिज्ञ)

"पता नहीं क्या समझता है अपने-आपको" - अभिनव बिन्द्रा के बारे में मेरी ये राय छह साल तक रही, अब उस राय पर मुझे संदेह हो रहा है। मगर इसलिए नहीं कि उसने देश का नाम रोशन किया, तिरंगे की लाज रखी, राष्ट्रगान बजवाया, और तथाकथित रूप से एक अरब से भी अधिक लोगों का मस्तक ऊँचा करवाया।

मुझे अपनी राय पर संदेह किन्हीं और कारणों से हो रहा है, ठीक उन्हीं कारणों से, जो अभिनव बिन्द्रा के ख़िलाफ़ जाते हैं।

जो सबसे बड़ी बात अभिनव बिन्द्रा के ख़िलाफ़ जाती है, वो ये, कि वो एक अत्यंत ही अमीर घर का लाड़ला है, उसने मेडल जीत ही लिया तो क्या? और जीता भी तो ऐसे खेल में जो, बकौल श्रद्धेय अफ़लातून जी के, राजा टाइप लोगों का खेल है।

मैं भी ऐसी ही राय रख रहा था, बहुतों ने तो ओलंपिक में अभिनव की जीत के बाद पत्र-पत्रिकाओं-टीवी पर उसकी पृष्ठभूमि पढ़ने-देखने के बाद अभिनव के बारे में एक नकारात्मक राय बनाई होगी, मैं तो छह साल से बनाए हुए था। मगर पता नहीं कब, अनायास कुछ सवालों ने आ घेरा -

कि अभिनव अगर अमीरज़ादा है तो क्या एक अरब वाले देश में वो अकेला अमीरज़ादा है?

कि अभिनव अगर राजा साहब टाइप है, तो क्या वो ऐसा अकेला राजा साहब टाइप है, बनारस से लेकर बलिया तक में ऐसे राजा साहब नहीं होते?

कि अभिनव की निशानेबाज़ी अगर रईसी का उदाहरण है, तो उसकी निशानेबाज़ी और सलमान-सैफ़-पटौदी साहब की निशानेबाज़ी में क्या कोई अंतर नहीं?

कि अभिनव के पिता यदि ये कहते हैं कि वो बचपन में नौकरानी के सिर पर गुब्बारे फोड़ता था, तो क्या अपनी औलाद के बारे में ऐसी डींग मारनेवाले उसके पिता ऐसे अकेले पिता हैं, टीवी पर गाना गानेवाले अपने नकलची बच्चों को देख सुबकते माता-पिता को क्या कहिएगा, अकेले बिन्द्रा साहब को धृतराष्ट्र की पदवी क्यों? फिर घर में नौकरों को उनकी हैसियत समझानेवाले बिन्द्रा साहब क्या ऐसे अकेले साहब हैं?

कि अभिनव को अगर अपने घर के कुत्तों की याद आती है, तो क्या श्वानों के प्रति ऐसा वात्सल्य रखनेवाला अभिनव अकेला व्यक्ति है?

कि अभिनव ने अगर विदेश में रहकर पैसे फूँककर ट्रेनिंग की, तो पैसे के बल पर विदेशों में रहकर शिक्षण-प्रशिक्षण करनेवाला क्या वो अकेला व्यक्ति है?

कि अभिनव ने अगर इंटरव्यू देते समय अकड़ दिखाई तो क्या ऐसी अकड़ दिखानेवाला वो अकेला सेलिब्रिटी है? सेलिब्रिटी तो दूर, ज़रा अपने इलाक़े के कलक्टर-डीएम-डीसी से ही बात करके देख लीजिए, अकड़ का अर्थ समझ में आ जाएगा।

ऐसे अमीर, ऐसे राजा साहब, ऐसे श्वानप्रेमी, ऐसे विदेशपठित-विदेशप्रशिक्षित लोग एक-दो नहीं हज़ारों और लाखों होंगे भारत में। लेकिन अभिनव बिंद्रा की गिनती उस भीड़ से अलग करनी होगी। अभिनव उन चंद लोगों में गिना जाना चाहिए जिसने अपनी संपन्नता को एक अर्थ दिया है। वो भारत का पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक विजेता है - ये बात इतिहास में दर्ज हो चुकी है, इतिहास ये नहीं देखता कि नायकों की पृष्ठभूमि क्या होती है, इतिहास देखता है, उसकी उपलब्धि को।

अभिनव की उपलब्धि पर छींटाकशी करना थोड़ी ज़्यादती लगती है, उसमें ख़ामियाँ हैं, ये सत्य है, लेकिन इस आधार पर उसे ख़ारिज़ कर देना एक दूसरे सत्य से मुँह चुराने के जैसा है। अभिनव के बहाने फिर वही टकराव का मनहूस रास्ता सामने खड़ा है जो पता नहीं किसी मंज़िल पर जाता भी है या नहीं? इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं कि दिल्ली और देहात की लड़ाई अभिनव के मेडल जीतने के बाद भी उसी जगह है, जिस जगह उसके मेडल जीतने से पहले थी, ऐसे में एक व्यवस्था पर चोट ना कर, किसी एक को निशाना बनाना, वो भी उसपर जिसने कुछ तो किया, ये थोड़ी छोटे दिल वाली सोच लगती है।

ये सवाल हमेशा खड़ा मिलता है - उपलब्धि किसकी बड़ी होनी चाहिए - उसकी, जिसके पास कुछ भी नहीं, या उसकी, जिसने बहुत कुछ छोड़ा।

जिनके पास कुछ नहीं, उनकी उपलब्धि की प्रेरणादायी कहानियों से हम हमेशा दो-चार होते हैं,अपनी हिम्मत-मेहनत-लगन से तकदीर बदलनेवालों की ऐसी कहानियाँ जीवन-पुरूषार्थ-कर्म के प्रति आमजनों के विश्वास को जीवित रखती हैं। मगर ग़ौर से देखा जाए तो कुछ हासिल करने के लिए- जिनके पास सबकुछ है - शायद उनको भी उतना ही संघर्ष करना पड़ता है जितना जिनके पास नहीं है उनको।

अभिनव अमीर है, स्मार्ट है, अंग्रेज़ीदां है, सेलिब्रिटी भी है - भौतिक सुखदायी ऐसे कौन से साधन हैं जो उसकी पहुँच से बाहर रहे होंगे? लेकिन उसने अपने आप पर नियंत्रण किया होगा, बहुत सारे प्रलोभनों पर विजय पाई होगी, अपनी संपन्नता को एक मक़सद दिया होगा, और तब जाकर उसने हासिल की, एक ऐसी उपलब्धि, जिसपर घरवाले जो कहना है कहें, बीजिंग में जुटे बाहरवाले एक उपलब्धि की निगाह से देखते हैं।

यदि मात्र संपन्नता से ही सबकुछ जुटाया जा सकता तो क्या आज धन्नासेठों की अट्टालिकाएँ स्वर्ण पदकों से नहीं चमचमा रही होती? अभिनव की उपलब्धि शायद गाँव-देहात में सिमटे लोगों के लिए कोई मायने नहीं रखती होगी, लेकिन आज के आधुनिक भारत का भार कंधे पर टाँगे टहल रहे युवाओं के लिए एक आदर्श बेशक बन सकती है।

सोचिए कि अगर दो-चार प्रतिशत धन्नासेठ भी अभिनव बिन्द्रा की ही तरह अपनी धन-दौलत ऐसी किसी किसी चीज़ में लगा दें, जिससे कि भारत को मेडल मिलता हो, तो उससे मेडल ही आएगा ना, वो मोटर-मोहिनी-मदिरा में तो ज़ाया नहीं होगा। और ऐसी कल्पना तो दिवास्वप्न ही होगी कि राजा टाइप लोग स्वयं ही, बेबात रंक सरीखों में अपना ऐश्वर्य लुटा देंगे।

मैं इसलिए अपनी राय कि - "पता नहीं क्या समझता है अपने-आपको" - इस राय को बदलता हूँ। अब मुझे लगता है कि - "शायद समझता है वो अपने-आपको"।

शायद समझता हो वो सेनेका की इस उक्ति का सार - "Wealth is the slave of a wise man. The master of a fool."

Thursday 21 August 2008

अभिनव बिन्द्राः एक अक्खड़ अमीर?

"पता नहीं क्या समझता है अपने आपको" - कुछ ये सोचते हुए लौटा था मैं जुलाई 2002 की उस शाम को, लंदन से कोई 50 किलोमीटर दूर, सरे काउंटी के छोटे से शहर - बिस्ली - में स्थित नेशनल शूटिंग सेंटर से।

और अभिनव बिन्द्रा के बारे में मेरी ये राय छह साल तक बनी रही।

बात है मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स की - जहाँ भारत ने तहलका ही मचा दिया था - 32 स्वर्ण, 21 रजत, 19 कांस्य! सबसे कमाल का प्रदर्शन था निशानेबाज़ों का - 14 स्वर्ण, 7 रजत, 3 कांस्य!

पूरा भारत आनंदित था,कि भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स में सिक्का जमा दिया; बिस्ली में जमा सारी भारतीय शूटिंग टीम उत्साहित थी,कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी उपस्थिति का अहसास करा दिया;वहाँ मौजूद सारे भारतीय पत्रकार संतुष्ट थे,कि उनका आना सार्थक रहा।

लेकिन केवल एक शख़्स ऐसा था जो ना आनंदित था, ना उत्साहित और ना संतुष्ट - अभिनव बिन्द्रा।

अंजलि वेद भागवत,राज्यवर्धन राठौड़,जसपाल राणा,समरेश जंग,सुमा शिरूर - सबने ख़ुशी-ख़ुशी बात की। एक सिवा अभिनव के।

इंटरव्यू के लिए गया तो उसने कहा - जो पूछना है जल्दी पूछो, मुझे नहाने जाना है। बेबात की हड़बड़ी का माहौल बनाया उसने, और फिर ऐसे जल्दी-जल्दी बात की, मानो उसका कुछ छूटा जा रहा है। और बोला भी तो क्या बोला - कॉमनवेल्थ में मेडल मिलना कोई बड़ी बात नहीं है, यहाँ तो मुक़ाबला आसान रहता है!

लेकिन इसके बाद देखता हूँ - अगले सात-आठ घंटे तक वो वहीं आस-पास टहल रहा है। मैंने क्रुद्ध निगाहों से घूरा - क्या हुआ,नहाने जानेवाले थे ना? मगर उसकी निगाह कहीं और थी, वो परेशान था।

उसे बांग्लादेश के एक 15 साल के लड़के ने हरा दिया था - आसिफ़ हुसैन ख़ान। बिल्कुल ही मोहल्ले का लोकल लड़का लग रहा था आसिफ़, कम-से-कम वेल-ड्रेस्ड अभिनव के सामने, अभिनव को अपनी हार पच नहीं रही थी, वो उस लड़के से सवाल पूछे जा रहा था, उसकी निगाहों से लगा जैसे उसे आसिफ़ पर संदेह है, कम-से-कम उसकी उम्र पर, वो किसी भी सूरत में 15 वर्षीय किशोर नहीं लग रहा था, तब अभिनव 19 का रहा होगा।

बहरहाल मैं बिस्ली से लंदन लौटा, यही राय मन में बनाए कि - "पता नहीं क्या समझता है अपने आपको"।

ये राय ग़लत नहीं है, इसका विश्वास ओलंपिक शुरू होने से पहले भी तब हुआ जब एक सहयोगी को, जो ओलंपिक पर विशेष सामग्रियाँ जुटा रहा था, ये कहते हुए सुना - सबसे बात हो गई है, राठौड़, अंजलि, समरेश - एक बिंद्रा ही बात नहीं कर रहा।

मगर पिछले सप्ताह जब सुबह-सुबह अभिनव की जीत की ख़बर देखी, तो एकबारगी अपनी राय पर संदेह होने लगा। ये संदेह फिर दफ़्तर जाते ही दूर भी हो गया, जब सबको बोलते सुना - यार पूरा देश नाच रहा है, लोग रो रहे हैं, एक बस अकड़ के बैठा हुआ है तो अभिनव बिन्द्रा।

वो तो किसी से बात कर नहीं रहा था, उसकी माँ मिलीं तो बोलीं - उसने फ़ोन किया था और जब मैंने कहा कि हम मीडिया से बात कर रहे हैं, तो उसने कहा - आर यू क्रेज़ी! फिर उसने अपने दोनों कु्त्तों का हाल पूछा और कहा कि बाद में बात करेगा! पिता से बात की तो वो बोले - दो हज़ार बोतलें मँगवा ली हैं, शैम्पेनें हैं, व्हिस्कियाँ हैं, आओ-पीओ-ऐश करो!

फिर पता चला - उसने घर में शूटिंग रेंज बनाया हुआ है, तीन महीने से विदेश में है, एक कंपनी का सीईओ है, दून और सेंट स्टीफ़ेंस से पढ़ा है।

बस - इतना काफ़ी था। सारे सहयोगियों के चेहरे तमतमा उठे। मेरी राय - कि पता नहीं अपने-आपको क्या समझता है - इसमें एक और राय जुड़ गई - पैसेवाला बिगड़ैल है, अमीर बाप का बेटा।

मुझे राहत मिली - चलो मेरी राय शर्मिंदा होने से बच गई।

फिर उसके बाद इधर-उधर काफ़ी कुछ मिला पढ़ने को जिनका सार यही था - अभिनव घमंडी नहीं, एकांतप्रिय है। वैसे अपने समाज में नायकों के पूजन की परंपरा रही है, तो इसलिए अब पारखी जन अभिनव बिन्द्रा के गुणों को तलाशने और तराशने में जुट जाएँगे - इसमें कोई अचरज की बात नहीं।

मगर अब मैं अपनी राय बदल रहा हूँ। अब मुझे लग रहा है - "शायद समझता है वो अपने-आपको"।

क्यों बदल रहा हूँ मैं अपनी राय - ये अगले लेख में।

Tuesday 5 August 2008

फिर आना मम्मी

मम्मी आज वापस भारत चली गई, घर ख़ाली हो गया, ज़िन्दगी पुराने ढर्रे पर लौट आई, पिछले पंद्रह साल से चली आ रही ज़िंदगी, घर से बाहर रहने की ज़िंदगी - अपनी ज़िंदगी, अपनी आदतें, अपना परिवार, अपना घर, अपना बसाया घर।

ठीक पंद्रह साल पहले नियति ने एक पगडंडी पर ला खड़ा किया था, जो घर से बाहर जाती थी। फिर तो घर से बाहर का रास्ता दिखानेवाली उस पगडंडी से न जाने कितनी बार गुज़रता रहा - बनारस-घर, दिल्ली-घर, गोहाटी-घर, कलकत्ता-घर, लंदन-घर...

हर बार उस पगडंडी के एक तरफ़ घर होता था, मम्मी होती थी, और दूसरी तरफ़ मैं होता था। कभी आता हुआ, कभी जाता हुआ।

आता तो मम्मी का खु़श चेहरा दिखाई देता, जाता तो हाथ हिलाती मम्मी खड़ी रहती। पहले ऑटो से हाथ हिलाया करता, फिर स्लीपर बोगी की खिड़की से, फिर एसी कम्पार्टमेंट के दरवाज़े पर खड़े होकर, और अब एयरपोर्ट के डिपार्चर लाउंज पर।

पंद्रह सालों से चला आ रहा ये सिलसिला अब तो एक आदत के जैसा लगने लगा था, साल-दर-साल छुट्टियों में घर जाना, मुस्कुराती मम्मी का घर के दरवाज़े पर खड़ा मिलना, कुछ हफ़्ते या फिर महीना भर घर पर रहना, फिर वापसी, मुस्कुराती मम्मी, हाथ हिलाते हुए विदा करती मम्मी।

लेकिन आज - कुछ अलग हुआ, आज मम्मी गई, और एयरपोर्ट के डिपार्चर लाउंज के बाहर खड़ा मैं हाथ हिलाता रहा।

महीने भर पहले भी ऐसा ही कुछ अलग हुआ था, एयरपोर्ट से बाहर मैं नहीं निकला, मम्मी निकली थी, मैं बाहर खड़ा था।

पिछले एक महीने से मम्मी साथ थी, पंद्रह साल में पहली बार ऐसा हुआ जब इतना लंबा अर्सा मम्मी के साथ बिताया, मम्मी को उस रूप से दूसरे रूप में देखा, जिसमें बचपन से आज तक देखता रहा था, इस बार वो हम भाई बहनों के खाने-पीने के इंतज़ाम में घिरी मम्मी नहीं थी, ना वो पूरे घर की सफ़ाई में भिड़ी हुई मम्मी थी, ना ही मोहल्ले में लडुआ की दूकान से बिस्कुट-साबुन-सर्फ़ या कॉलोनी की सब्ज़ी की दूकान से आलू-प्याज़-परबल लेकर घर लौटती हुई मम्मी थी।

इस बार मम्मी लंदन में थी, हमारे घर थी, वो हमारे साथ सुपरस्टोर में ख़रीदारी कर रही थी, मैक्डोनल्ड्स में आलू के चिप्स और वेजिटेबल पैटीज़ खा रही थी, मैडम तुसॉद्स में नक़ली शाहरूख़-सलमान तो नेहरू सेंटर में असली ओम पुरी-गिरीश कर्नाड के साथ फ़ोटो खिंचा रही थी, केम्बिज युनिवर्सिटी में नेहरू जी और मनमोहन सिंह का कॉलेज देख रही थी, और जिसने आज तक ना कोई समुंदर देखा, ना पहाड़, वो मम्मी सात समुंदर पार एडिनबरा में समुंदर किनारे टहल रही थी, स्कॉटलैंड के ख़ूबसूरत पहाड़ों के तले खड़ी थी!

लंदन की टूरिस्ट मम्मी, घर की गार्जियन मम्मी से बिल्कुल अलग थी। लंदन की मम्मी का चेहरा उत्साह से दमक रहा था, उसके पाँव समुंदर की लहरों से मिलकर थिरक रहे थे, उसके बढ़-चढ़कर फ़ोटो खिंचवाए जा रही थी। मम्मी उन सब जगहों पर हमारे साथ थी, जिन जगहों पर इससे पहले केवल मैं और मेरी पत्नी या कभी-कभार बाहर से आए कुछ दूसरे रिश्तेदार या दोस्त जाया करते थे।

मम्मी आज चली गई, पत्नी एयरपोर्ट से ही दफ़्तर निकल गई, मैंने छुट्टी ली है, तो मैं घर लौटा हूँ, घर पर आज महीने भर बाद ख़ुद चाभी से दरवाज़ा खोलना पड़ा, महीने भर से कॉल बेल बजाया करता और मम्मी दरवाज़े पर खड़ी मिलती।

वैसे अपनी चाभी से अपने कमरों के दरवाज़े खोलने का ये सिलसिला कोई नई बात नहीं, पहले होस्टल का कमरा होता था, फिर जहाँ-जहाँ रहा वहाँ के कमरे। पंद्रह सालों से ऐसा ही चल रहा है।

लेकिन पंद्रह सालों में आज पहली बार कुछ अलग-सा महसूस हो रहा है। पहली बार ये समझ पा रहा हूँ कि कि कैसा लगा करता रहा होगा मम्मी को - पिछले उन पंद्रह वर्षों से, जब वो हाथ हिलाती पहले बेटे को, और फिर बाद में बेटे-बहू को विदा करती होगी और वापस उन दीवारों की ओर लौटती होगी, जिसके हर कोने में-हर क़तरे में कुछ देर पहले तक कोई और भी बसा हुआ था।

मैं तो बस घंटे-डेढ़ घंटे में फ़ोन लगाकर मम्मी से बात कर स्वयँ को आश्वस्त भी कर लूँगा कि मम्मी की यात्रा कैसी रही, लेकिन आज ये कल्पना ही विचित्र लगती है कि कैसा लगता रहा होगा मम्मी को उन दिनों जब ना फ़ोन था ना मोबाईल, बस चिट्ठियाँ ही बताया करतीं ये हाल कि ट्रेन कितने घंटे देर से पहुँची और रास्ते में क्या-क्या हुआ।

आज लंदन के इस ख़ाली घर में घर से बाहर निकलनेवाली पिछले पंद्रह सालों की वे सारी यात्राएँ याद आ रही हैं। लंदन का ये ख़ाली घर आज कह रहा है - फिर आना मम्मी, ज़रूर आना, तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लग रहा।

Wednesday 12 March 2008

हॉकी का हाहाकार और हुआँ-हुआँ

देश में हॉकी पर हाहाकार मचा है, मीडिया मातमपुर्सी पर बैठ गया है, संसद के गलियारे में गुरूदास दासगुप्ता गिल को गलिया रहे हैं, सड़क पर अपना आम आदमी भी वॉक्स-पॉप देने के लिए ज़ोर लगाए हुए है।

मगर बोलेंगे तो कौन सी नई बात बोलेंगे? करिश्माई क्रिकेट और हताश हॉकी के बीच का भेद-भाव? खेल बनाम राजनीतिक दखलंदाज़ी? यही सब बातें उठेंगी ना? और फिर डिक्शनरी के उन्हीं घिसे-पिटे शब्दों में कसमसाती बहस बेनतीजा दम तोड़ देगी। इसका इतर किसी परिणाम की आशा जिन्हें हो, उनकी आशावादिता को शत्-शत् प्रणाम।

लेकिन ये भी है कि बहस से बचना, पलायन करने के समान है। और जब अमर्त्य सेन ने हम भारतीयों को - द आर्ग्युमेन्टेटिव इंडियन - की संज्ञा दे ही दी है, तो आर्ग्युमेन्ट किए बिना जान कैसे छूटेगी? अब ये अलग बात है कि जो हुआँ-हुआँ मची है, उसमें सारी हुआँओं का राग एक ही सुनाई दे रहा है - राग क्रंदन।

हुआँकारों से बस एक ही सवाल है - जो हुआ उसका अंदेशा क्या पहले से नहीं था?

एक समय था जब हॉकी टीम के सितारों - ज़फ़र इक़बाल, मोहम्मद शाहिद, थोएबा सिंह, विनीत कुमार, परगट सिंह, एम पी सिंह, सोमैय्या जैसे नाम, सुनील गावस्कर, कपिल देव, रवि शास्त्री, किरमानी, श्रीकांत, अज़हरूद्दीन जैसे नामों की ही तरह युवाओं में लोकप्रिय हों ना हों, अनसुने बिल्कुल नहीं होते थे।

जिस भक्तिभावना से क्रिकेट की कमेंट्री सुनी जाती थी, उसी आस्था से विश्व कप, ओलंपिक, चैंपियंस ट्रॉफ़ी जैसे हॉकी टूर्नमेंटों में भारत के मैचों के समय भी खेल प्रेमी, फ़िलिप्स-बुश-संतोष के ट्रांजिस्टरों से कान लगाए बैठे रहते थे।

आज - गुस्ताख़ी माफ़ हो, मगर बेशर्मी से लिख रहा हूँ कि एक प्रोफ़ेशनल मीडियामानव होने के बावजूद, मुझे स्वयं नहीं पता कि भारतीय टीम का कप्तान कौन है? धनराज पिल्लई के बाद दिलीप तिर्की के नाम तक याद है, लेकिन फिर हॉकी से मेरा वास्ता बस किसी मैच की कहानी बताने भर से रह गया है।

अभी भी जब हॉकी की बहस चल रही है, तो कारवाल्हो ने इस्तीफ़ा दिया-गिल ने नहीं दिया, इससे अधिक मुझे कुछ नहीं पता कि कौन कप्तान है, कि किसने कितने गोल मारे, और कि किसने कितने बचाए?

और ऐसे में हॉकी पर शर्म करने के बजाय, मुझे अपने आप पर शर्म आ रही है। लेकिन छिछले राष्ट्रवाद और झूठे आत्मगौरव के दौर में मैं भी हुआँ-हुआँ करने के लोभ का संवरण नहीं कर पा रहा।

पर आज इस हुआँ-हुआँ में अपनी हुआँ मिलाने के साथ-साथ, मैं अपने आप को इन सवालों से जूझता पा रहा हूँ - भारतीय हॉकी के अंतिम सुपरस्टार धनराज पिल्लई की जब बेमौक़े मूक विदाई हो गई - तब क्यों नहीं की हुआँ-हुआँ? जब साल भर पहले ओलंपियन विनीत कुमार ने कैंसर से लड़ते हुए दम तोड़ दिया और मीडिया में ये कोई ख़बर नहीं बनी - तब क्यों नहीं की हुआँ-हुआँ? चक दे इंडिया की सफलता के ठीक बाद, जब अपने किंग 'क्रिकेट' ख़ान दक्षिण अफ़्रीका में क्रिकेटरों के साथ गलबँहिया कर हॉकी को बेशर्मी से छका रहे थे - तब क्यों नहीं की हुआँ-हुआँ? जिस दिन ये पढ़ा अख़बार में, कि एक क्रिकेटर की मैच की कमाई 40 हॉकी खिलाड़ियों की मैच की कमाई के बराबर है - उस दिन क्यों नहीं की हुआँ-हुआँ? और हाँ, ये "एक क्रिकेटर= 40 हॉकी खिलाड़ी" - वाला आँकड़ा 10 साल पहले का है, अब तो शायद कैलकुलेटर भी तुलना करने में शर्मा जाए!

तो ख़ामोश बैठे, बरसों तलक मर्ज़ को मौत बनता देखते रहने के बाद, हुआँ-हुआँ करना है तो करें, लेकिन इतना याद रखें कि समय रहते हुआँ-हुआँ करते, तो आज राग कुछ और होता।

शायद राग क्रंदन के स्थान पर वो राग वंदन होता और शायद हम हुँआ-हुँआ नहीं, आँहु-आँहु करते झूम रहे होते!

Wednesday 5 March 2008

पार्डन माई ब्रोकेन इंग्लिश

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स, जॉर्जेज़ हेनरी नाम के इलाक़े का एक चौराहा, चौराहे के एक कोने पर खड़ा मैं, दाईं तरफ़ है मीरोड नाम का मेट्रो स्टेशन, बाईं तरफ़ ट्राम का स्टॉप। सामने एक दूकान के ऊपर लगी इलेक्ट्रोनिक घड़ी, सात बजे शाम का समय दिखाने के साथ-साथ तापमान भी बता रही है -1.5 डिग्री...मतलब ठंड कड़ाके की है।

मैं जेब में हाथ डाले इधर-उधर देख रहा हूँ, समय काट रहा हूँ। पत्नी बगल में एक ब्यूटी पार्लर में बाल बनवाने गई है। अंदर भी बैठा जा सकता था, लेकिन ज़िंदगी में आजतक कभी लेडिज़ तो क्या, सैलून छोड़कर किसी जेंट्स ब्यूटी पार्लर में भी क़दम नहीं रखा, जहाँ सुना है बाल कटवाने के अलावा भी कई और उपायों से लड़कों की सुंदरता को सँवारा जाता है। भय कहें, संकोच कहें, भीतर नहीं जा सका। बाहर ठंड में ठिठुरता टहलक़दमी करता रहा।

कुछ पल बीते होंगे, देखा ट्राम स्टेशन पर दो लड़कियाँ खड़ी हैं, गोरी, आपस में बातें कर रही हैं, मेरी ओर भी देख रही हैं। कुछ पल और बीते, देखा दोनों मेरी तरफ़ आ रही हैं, मुस्कुराते हुए। दिल बल्लियों उछला कि नहीं इसका मुझे भान नहीं, मगर इतना अवश्य था कि समयकाटू अवस्था में ज़रा रोमांच ज़रूर अनुभव होने लगा। समयकाटू अवस्था कुछ ऐसी थी कि सभी ओर देख-दाख लेने के बाद भी कुछ देखने लायक ना बचा, तो दूकान के ऊपर लगी घड़ी को ही बार-बार देख रहा था। तापमान कभी -1 तो कभी -1.5 होता जाता था। कभी सात, सवा सात बना जाता, तो कभी सात बीस।

और दोनों लड़कियाँ आ ही गईं। मगर साहब...कहानी यहीं समाप्त। जो वो मुझसे कहें, वो मेरे पल्ले ना पड़े, और मैं जो अँग्रेज़ी बोलूँ, वो उन्हें ना समझ आए। मेरे रोमांच का अंत कुछ ऐसा हुआ - गोरियाँ जैसे मुस्कुराते आई थीं, वैसे ही चली गईं। मैं हक्का-बक्का खड़ा रहा।

फिर एक ट्राम आई, दोनों उसपर बैठीं, ट्राम चल पड़ी। दोनों ने जाते-जाते मेरी ओर देखा या नहीं पता नहीं, मगर मैंने देखा। और जब देखा तो वो मेरी ओर नहीं देख रही थीं।

दोनों चली गईं, एक पहेली छोड़कर। मुझसे ट्रेन की लाईन के बारे में पूछ रही थीं? ट्राम का नंबर जानना चाहती थीं? कोई पता पूछ रही थीं?या कोई मदद माँग रही थीं? - मुझे कुछ पता ही नहीं चला कि वो आख़िर आई क्यों थीं मेरे पास।

और ये स्थिति इसलिए थी क्योंकि मुझे उनकी भाषा - फ्रेंच और फ़्लेमिश - नहीं आती थी, और उनको अँग्रेज़ी नहीं आती थी। गोरे होने के बावजूद अँग्रेज़ी नहीं आती थी।

बेल्जियम में ऐसे कई क्षण आए, जब भाषाई उलझन पेश आई। अँग्रेज़ी की अल्प समझ होने के बावजूद, अक्सर ऐसा हुआ कि, अँग्रेज़ी भाषाई पुल की भूमिका निभाने में नाकाम रही। ये अगर भारत के किसी क़स्बे-मोहल्ले की बात होती तो आश्चर्य नहीं होता, लेकिन ये तो गोरों का देश था। गोरों को अँग्रेज़ी नहीं आती - मुझे ज़रूर आश्चर्य हुआ, क्योंकि भूरे अँग्रेज़ों के साए से प्रभावित और आक्रांत भारत में समझ तो ऐसी ही हो गई है, कि गोरा मतलब अँग्रेज़। मगर गोरा होना और अँग्रेज़ होना - दोनों अलग-अलग बातें हैं, ये बात बेल्जियम के अँग्रेज़ी ना जाननेवाले गोरे-गोरियों के संपर्क में आने के बाद ही समझ में आई।

अब मुझ जैसे प्राणी को आश्चर्य भले हो रहा हो, लेकिन गोरों के लिए ये कोई आश्चर्य की बात नहीं। यूरोप में, ब्रिटेन से बाहर निकल जाएँ, तो चाहे बेल्जियम हो, या फ़्रांस, या इटली, या स्पेन, वहाँ ऐसे गोरे-गोरियों की भरमार होगी, जिन्हें अँग्रेज़ी नहीं आती। लेकिन इससे क्या कोई फ़र्क़ पड़ता है? नहीं। वहाँ रहनेवाले आराम से अपनी ज़िंदगी बिता रहे हैं। उनके लिए उनके देश की भाषा ही सबकुछ है, उससे अधिक की उन्हें ना लालसा है, ना ज़रूरत।

मगर कल्पना कीजिए कि अपने भारत में, कम-से-कम देश की राजधानी में, कनॉट प्लेस के किसी मेट्रो स्टेशन पर, कम-से-कम उन दो गोरियों की सरीखी उम्र के युवाओं के बीच, क्या आज कोई ऐसा सोच सकता है, कि अँग्रेज़ी के बिना ज़िंदगी आराम से बीत जाए? जो जानता है, वो चौड़े होकर टहलता है। जो नहीं जानता, उसके दिल में ये खटका ज़रूर लगा रहता है कि हिंदी-बांग्ला-तमिल-गुजराती ठीक है, मगर अँग्रेज़ी भी आ जाती तो दुनिया जीत लेते। मैक्डॉनल्ड में खाना हो, या किंगफ़िशर की फ़्लाइट पर चढ़ना हो - अँग्रेज़ी जानने से कॉन्फ़िडेंस रहता है। और ना जानने से अक्सर नहीं रहता है।

भारत में अँग्रेज़ी संवाद की नहीं, अकड़ की भाषा बन चुकी है। मोबाईल फ़ोन कंपनी के किसी कर्मचारी से बातचीत करनी हो, एयरपोर्ट पर टिकट ख़रीदना हो-चेक इन करना हो-एयरहोस्टेस को बुलाना हो , मल्टीप्लेक्स सिनेमा में टिकट-कोल्ड ड्रिंक्स लेना हो, या फिर टाइटन-आर्चीज़-मैक्डॉनल्ड्स-वूडलैंड्स-शाहनाज़ ब्यूटी पार्लर जैसी चमचमाती दूकानों में पाँव रखना हो - क्या ये एहसास नहीं होता कि जो अँग्रेज़ीदां तबक़ा है, उस क्लब का ग्राहक सम्मान भी पाता है, सहूलियत भी।

और ये भेद-भाव केवल ज़ुबान तक ही सीमित नहीं रहता, अँग्रेज़ियत आपके पहनावे, चाल-ढाल से भी दिखनी आवश्यक है। बल्कि वो शायद अधिक आवश्यक है क्योंकि जहाँ अटके, वहाँ - लाइक-आई मीन-यू नो - जैसे बैसाखीरूपी शब्दों के सहारे अँग्रेज़ी ज्ञान बघारने की बेशर्म कोशिश करते, लेकिन जींस पहने-जेल लगाए किसी ग्राहक की अँग्रेज़ी, अँग्रेज़ी बोलने की कोशिश करते उस ग्राहक की अँग्रेज़ी से बेहतर समझी जाती है, जो टेरीकॉटन पैंट पहने-तेल लगाए आता है लेकिन बस शुगर को सूगर बोल जाने के कारण शर्मा जाता है। बात अगर केवल अँग्रेज़ी ज्ञान की होती तो जींसधारी को भी अपनी अल्पज्ञता पर वैसी है शर्म आती जितनी कि टेरीकॉटन पैंटधारी को। लेकिन बेशर्मी शर्म पर हावी रहा करती है।

और ये सब हुआ है इसलिए क्योंकि भारत ने गोरों को तो देखा, लेकिन उन गोरों को कभी नहीं देखा, जिन्हें अँग्रेज़ी नहीं आती। लेकिन क्या अँग्रेज़ी जाननेवाले गोरों और अँग्रेज़ी नहीं जाननेवाले गोरों में कोई अंतर है? नहीं है। दोनों अपनी-अपनी दुनिया के मालिक हैं। बेल्जियम-फ्रांस-जर्मनी-इटली-स्पेन-नॉर्वे-फ़िनलैंड-डेनमार्क-रूस के निवासी किसी भी कीमत पर ब्रिटेन-अमरीका-कनाडा-ऑस्ट्रेलिया से हीन या कमतर नहीं हैं। अँग्रेज़ी नहीं जाननेवाले गोरे, ना ये सोचकर मन मारे रहते हैं कि उन्हें अँग्रेज़ी नहीं आती, और ना अँग्रेज़ी जाननेवाले गोरे, ये सोचकर कि उनको अँग्रेज़ी आती है, इठलाते फिरते हैं। दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। भारत में ये बड़प्पन नहीं दिखाई देता।

यूरोप की राजधानी कहे जा सकनेवाले ब्रसेल्स में ही टहलते हुए एक दिन मैं और मेरी पत्नी भटक गए। मेरी पत्नी ने फ़्रेंच के कुछ वाक्य सीख रहे थे, उन टूटे-फूटे वाक्यों के सहारे उसने फ़ुटपाथ पर जैकेट-टोपी-मफ़लर में लिपटे एक पढ़े-लिखे से लग रहे बुज़ुर्ग से संवाद स्थापित किया। पहले फ़्रेंच, फिर अँग्रेज़ी में कुछ वाक्यों के सहारे उस बुज़ुर्ग ने, एक चौराहे पर जाकर हमें रास्ता दिखा दिया।

चलते समय मेरी पत्नी ने उसे - "मेसी" - फ़्रेंच में धन्यवाद देते हुए कहा - "पार्डन माई ब्रोकेन फ्रेंच।"

जवाब में उस बुज़ुर्ग ने भी कहा - "पार्डन माई ब्रोकेन इंग्लिश।"

क्या भारत में 'प्रॉपर इंग्लिश' बोलनेवाले और 'ब्रोकेन इंग्लिश' बोलनेवाले, किसी चौराहे पर एक साथ, बिना किसी हीन-भावना के-बिना किसी श्रेष्ठ भावना के, पूरे आत्मविश्वास के साथ, अपनी-अपनी राह पकड़, उसपर नहीं चलते रह सकते। बिना इठलाए, बिना हिचकिचाए। थोड़ी बहुत अँग्रेज़ी तो सबको आती ही है ना? ये वाक्य तो आपने भी सुना ही होगा अपने आस-पास, कभी-ना-कभी - "जानते तो हैं यार, मगर बोल नहीं पाते, हिचकिचाहट होती है।"

क्या साहबों की भाषा सीखकर बड़ा साहब दिखने की कोशिश ही इस नक़ल का अंत है? बड़प्पन की नक़ल क्यों नहीं हो रही?

Friday 1 February 2008

क्या मुस्कुराना भूल गया बिहार?

अँग्रेज़ी के महानतम लेखक शेक्सपियर के जन्मस्थान- ‘स्ट्रैटफ़र्ड-अपॉन-एवन’- से एक फ्रिज मैगनेट लेकर आया था जिसपर शेक्सपियर के नाटक ‘ट्वेल्फ़्थ नाइट’ की एक उक्ति लिखी थी – बेटर ए विटी फ़ूल दैन ए फ़ूलिश विट – समझदारी से की गई मूर्खता, मूर्खता से समझदारी दिखाने से बेहतर है।

इसी उक्ति पर पटना में अपने भाई के साथ चर्चा हो रही थी, मैंने कुछ मिनटों तक भाई को उस दिलचस्प उक्ति के बारे में समझाने की कोशिश की। वो बिल्कुल समझ गया, और कहा – एतना घुमाके बोलने का क्या ज़रूरत है, सीधे बोलिए ना भाई कि - ‘क़ाबिल’ नहीं बनना चाहिए!

गागर में सागर भरनेवाली ऐसी कितनी ही विशुद्ध बिहारी उक्तियों के रसास्वाद के लिए तरसते हैं विदेशों में बसे बिहारी।

ब्रिटेन में बिहारियों की संख्या कितनी है – बताना मुश्किल है। कोई जुगाड़ बैठाकर, गणित-विज्ञान आदि का सहारा लेकर अंदाज़ा लगाया जाए, इसमें भी कई पेचीदगियाँ हैं। फिर भी मोटा-मोटी बात की जाए तो चार चीज़ों से अंदाज़ा लग सकता है।

पहली बात ये कि अंतिम जनगणना के हिसाब से ब्रिटेन में बाहर के देशों से आकर बसे लोगों में आधे से अधिक एशियाई हैं। दूसरी कि इनमें सबसे अधिक संख्या है भारतीयों की, जो कोई साढ़े दस लाख है और जो ब्रिटेन की कुल आबादी का 1.8 प्रतिशत हिस्सा है। वैसे इनमें शुद्ध भारतीय नागरिकों की संख्या कम ही होगी, भारतीय मूल के लोग अधिक हैं। तीसरी बात ये कि इन भारतीयों में सबसे अधिक संख्या है गुजरातियों की, उनकी संख्या है साढ़े छह लाख। और चौथी बात ये कि जो बाक़ी बचे साढ़े चार लाख भारतीय हैं उनमें भी पंजाबियों की संख्या सर्वाधिक है। इसप्रकार बाद बाक़ी जो संख्या बचती होगी उसमें ही बिहारियों का अस्तित्व समाहित होगा।

ख़ैर उबाऊ आँकड़ों को परे रख सपाट भाषा में ब्रिटेन के बिहारी समुदाय को, अल्पसंख्यकों में भी अल्पसंख्यक कहा जाए तो इसमें कोई ग़लती नहीं होगी।

पंजाब यहाँ आए दिन एशियाई बहुल इलाक़ों में किसी बीएमडब्ल्यू-मर्सीडिज गाड़ी के साउंड सिस्टम से निकलते अस्थिकंपक संगीत के रूप में दिख जाएगा; गुजरात यहाँ किसी भी जेनरल स्टोर के काउंटर पर खड़े विनम्र दूकानदार की मुस्कुराहट में मिल जाएगा; ब्रिक लेन नामक इलाक़े में रोहू और इलिश माछ की सुगंध के साथ बंगाल भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा लेगा और ईस्ट हैम जैसे इलाक़ों में सुपरस्टार रजनीकांत की फ़िल्मों के पोस्टरों के रूप में दक्षिण भारत का चेहरा भी दिख जाएगा; लेकिन बिहार उसी तरह ढूँढे नहीं मिलेगा जिसतरह यूपी,एमपी या ऐसे अन्य प्रदेशों का अस्तित्व।

वैसे बिहारियों की कमज़ोर उपस्थिति में अस्वाभाविक कुछ नहीं है क्योंकि गुजराती और पंजाबी समुदाय के लोगों का थोक संख्या में बाहर निकलना ब्रितानी राज के दौरान ही शुरू हो चुका था। तो पुराने वटवृक्ष से निकली शाखाओं से वटवंश का प्रसार तो होगा ही।

बिहार के लोग अभी बाहर निकल ज़रूर रहे हैं, लेकिन ज़्यादातर प्रवासी अभी प्रोफ़ेशनल हैं, पहली पीढ़ी के हैं, जिनकी दुनिया दफ़्तर में गिनती के सहकर्मियों और घर पर एकाध सदस्यों के बीच बतियाने तक सिमटी है। घर का असल मतलब तो उनके लिए अभी भी वही बिहार है, वही मोहल्ला, वही गलियाँ, वही सड़कें, वही माटी, जिनके आशीष या श्राप से वे सात समुंदर पार पहुँचे। देसी भाषा में, पहली पीढ़ी के बिहारी प्रवासियों में बिहार के लिए एक ‘टान’ ज़रूर बसता है।

बिहार से छुट्टियों के बाद लौटनेवाले हर बिहारी से अपेक्षा होती है कि वह साथी बिहारियों के लिए अनुभवों-क़िस्सों की मोटरी लेकर आएगा। नीतिश राज में कुछ बदला कि नहीं, क्राइम घटा कि नहीं, बिजली रहती है कि नहीं, ऐसी आम उत्कंठाओं को शांत करने के बाद बोनस जानकारियाँ दी जाती हैं; कि अब पटना में भी पित्ज़ा-बर्गर वाली फ़ास्ट-फ़ूड दूकानें खुल चुकी हैं, जहाँ जींसधारी बालाएँ दिल्ली-बंबई को टक्कर देती नज़र आती हैं; कि अब पटना में भी रेडियो मिर्ची पहुँच चुका है, आदि-इत्यादि।

लेकिन यात्रा-वृत्तांत बिना हास्यरसास्वाद के समाप्त नहीं होता; बेगूसराय वाले दोस्त को खोजकर बताई जाती है बात कि ज़ीरो माइल पर एक साइनबोर्ड दिखा- ‘दिलजले हेयर कटिंग सैलून’...ठहाके लगते हैं और फिर बात पुराने दिनों में लौट जाती है; बेगूसरायवासी मित्र बताता है कि छात्रावस्था के दौरान रवीना टंडन बेगूसराय में ख़ासी पॉपुलर थी, और हो सकता है उसी के किसी ‘दिलजले’ आशिक़ ने सैलून का नाम......बात ठहाकों में खो जाती है। बिहार शब्द प्रवासी बिहारियों के लिए जी को हल्का कर देनेवाली मुस्कुराहट बन जाता है।

लेकिन फिर पटना में अपने भाई की एक बात याद आती है – बाहर हो तो मज़ा आ रहा है, यहाँ रहोगे तो जिस बात पर हँसी आता है उसी पर चिल्लाओगे!

मैंने अचानक ग़ौर किया कि सचमुच वहाँ आम जनजीवन में मुस्कुराहट कम ही दिखती है। बैंक हो, सरकारी दफ़्तर हो, होटल हो, सिनेमाघर हो, ऑटो हो, रिक्शा हो – मुस्कुराते चेहरे कम ही दिख रहे हैं। कहीं तनाव दिखता है, कहीं विषाद, कहीं रोष, कहीं अहंकार, कहीं क्रोध, कहीं झल्लाहट। मुस्कुराकर बात करो तो भी कोई नहीं मुस्कुराता। जान-पहचान के बाहर ऐसा एक भी व्यक्ति याद नहीं पड़ता जिसने मुस्कुराकर बात की हो।

तो क्या वाकई सात समुंदर पार बैठे बिहारियों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरनेवाला बिहार मुस्कुराना भूल गया है, या मेरी ही नज़र धोखा खा गई।

(ये लेख पिछले वर्ष 'प्रभात ख़बर' के बिहार विशेषांक में छपा था। अगले सप्ताह पटना जा रहा हूँ, इस उम्मीद के साथ कि भगवान करे सचमुच ही मेरी नज़र एक साल पहले धोखा खा गई हो)

Monday 28 January 2008

कैसे दिखाएँ देशभक्ति

दो दिन पहले इनबॉक्स में एक मेल आया, सब्जेक्ट में लिखा था - हैप्पी रिपब्लिक डे। भेजा मेरे एक ऐसे मित्र ने था, जिसके साथ मुझे पूरी तरह याद है, कि ना तो मैंने कभी 15 अगस्त मनाया था ना 26 जनवरी। लेकिन इस मेल ने देशभक्ति को लेकर मुझे धर्मसंकट में अवश्य डाल दिया।

देशभक्ति प्रदर्शन के ऐसे प्रतीकात्मक अवसरों पर धर्मसंकट और भी कई बार आए हैं। अक्सर ऐसा होता है कि जब जन-गण-मन बज रहा हो, तो मुश्किल में पड़ जाता हूँ कि कैसी मुद्रा में रहूँ। सावधान होना सही होगा या कि, घर के सोफ़े पर मरे रहने, या दफ़्तर की कुर्सी पर पड़े रहने, की मुद्रा में बदलाव के बिना काम चल जाएगा। अभी तक दो तरह की राय मिली है। एक में हिकारत के साथ त्यौरियाँ चढ़ाकर कहा गया -सोचना क्या है, बिल्कुल खड़े हो जाना चाहिए! दूसरे में शरारत के साथ मुस्कुराते हुए काट सुझाई गई - छत के नीचे खड़े होने पर ये नियम नहीं लागू होता है!

बहरहाल, याद नहीं पड़ता कि स्कूल में इस बारे में कोई नियम क़ानून सिखाया गया था। और भारत सरकार की राष्ट्रगान के बारे में आधिकारिक वेबसाइट पर भी जाकर चेक किया, वहाँ भी इस बारे में कुछ नहीं लिखा है, कि राष्ट्रगान बजे तो क्या करना चाहिए। ऐसी स्थिति में इस बार भी जब राष्ट्रगान बजा, असमंजस की स्थिति आई, और कोई फ़ैसला करूँ-करूँ, तबतक 52 सेकेंड निकल गए!

देशभक्ति-राष्ट्रगान-राष्ट्रीय प्रतीक ये सब एक गूढ़ पहेली वाले शब्द हैं हमारे समाज में। मातृभक्ति-पितृभक्ति-गुरूभक्ति-ईशभक्ति को तो सारे जहाँ को दिखा सकते हैं, महसूस कर सकते हैं। लेकिन देशभक्ति का क्या किया जाए? सैनिक हों-सुरक्षाकर्मी हों तो कह सकते हैं, कि देश के लिए जान हाथ में लेकर घूमते हैं; खिलाड़ी हों-कलाकार हों, तो बोल सकते हैं कि देश की प्रतिष्ठा का भार कंधों पर उठाकर घूमते हैं।

लेकिन उनका क्या, जिन्होंने अपनी-अपनी दुनिया में चाहे जितना कुछ बटोर-समेट लिया है, लेकिन हैं वह उसी भीड़ का हिस्सा - जिसे आम जनता कहा जाता है; या दूसरे शब्दों में - जो ख़ास नहीं है; या सीधे शब्दों में - जो सेलिब्रिटी नहीं हैं; या कठोर शब्दों में - जो लाख माल-जंजाल बटोरने के बावजूद, पद-प्रतिष्ठा अर्जित करने के बावजूद, एनआरआई बनने या अमरीकन-ब्रिटिश पासपोर्ट लेने के बावजूद, हैं उतने ही आम, जितना कोई भी दूसरा आम आदमी होता है। आम आदमी का नाम नहीं होता है।

अब संकट इसी आम आदमी के भीतर की देशभक्ति का है। वो क्या करे कि देशभक्ति दिखे?

तो उसकी देशभक्ति दिखती है कभी क्रिकेट के मैदान में झंडा लपेटकर चिल्लाते हुए (बीयर चढ़ी हो, तो उत्साह भी परवान पर रहता है); तो कभी दिखती है स्वदेस और रंग दे बसंती देखकर सुबकते हुए(परिवार साथ रहे इस समय तो और अच्छा)।

और चिल्लाने और नाकभिंगाउ रूलाई से भी जी ना भरे, तो ई-देशभक्ति ज़िन्दाबाद! दुनिया भर की वेबसाइटों पर जाकर अपनी देशभक्ति उगलिए - कि भगत सिंह को भारत रत्न देना चाहिए और सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी से भी बड़े नेता थे, या और नहीं तो यही कि भारतीय टीम को देश की इज़्ज़त के लिए ऑस्ट्रेलिया से वालस लौट आना चाहिए!

इसके बाद देशभक्ति का असहनीय उफ़ान, जब थम जाए, तो फिर जो चाहे कीजिए। काला पैसा कमाइए, काले कारनामे कीजिए, कामचोरी कीजिए, पढ़ाई के समय लफंगई कीजिए, अपने ही देश की संपत्ति को चूना लगाइए, अपने ही किसी देशवासी का हक़ मारिए - सब चलेगा।

देशभक्ति दिखाने का मौक़ा तो फिर आएगा ही - इंडिया-पाकिस्तान मैच, कोई और देशभक्ति वाली फ़िल्म, 15 अगस्त...26 जनवरी - हैप्पी रिपब्लिक डे!हैप्पी इंडिपेंडेंस डे!

पुनश्चः वैसे ये अलग बात है कि जन-गण-मन मैं अक्सर गुनगुनाता रहता हूँ, मुझे इसका सुर बड़ा अच्छा लगता है।(एक दो बार तो बाथरूम में भी गुनगुना पड़ा था कि स्थान का भान होने पर तुरंत थम गया) कैप्टेन राम सिंह ठाकुर का तैयार किया ओरिजिनल धुन शानदार है ही। कभी सुनकर देखिए ए आर रहमान के कम्पोज़्ड जन-गण-मन एलबम को। भारतीय शास्त्रीय संगीत के तमाम दिग्गज नामों ने, आठ रागों में, राष्ट्रगान को गाया और बजाया है। देशभक्ति अपनी जगह होगी, लेकिन यहाँ अलग-अलग आवाज़ों और साज़ों में जन-गण-मन को सुनने पर, वह एक ओजस्वी राष्ट्रगान से अधिक एक मधुर संगीतमय कृति के जैसा लगता है। एक सुंदर अनुभूति।

आप भी सुनिए रहमान का जन-गण-मन एलबम

Thursday 17 January 2008

माई फ़्रेंड इमैनुएल

मुस्कुराने में किसी का कुछ जाता नहीं, फिर भी बिना बात कोई मुस्कुराता नहीं।

मगर कुछ चेहरे बेबात मुस्कुराते हैं। वैसे मुस्कुराने के लिए तो, हम-आप भी मुस्कुराते हैं। कभी असली, तो कभी नक़ली मुस्कुराते हैं। लेकिन कुछ चेहरे सचमुच मुस्कुराते हैं। मन से मुस्कुराते हैं। हरदम मुस्कुराते हैं।

ऐसा ही एक चेहरा था इमैनुएल का। लंदन में हमारे दफ़्तर की कैंटीन के काउंटर पर बैठनेवाला इमैनुएल। किसी को याद नहीं कि कभी उसे बिना मुस्कुराहट के देखा हो।

खिली हुई मुस्कुराहट थी इमैनुएल की। एकदम बच्चों के जैसी - जिनकी खिलखिलाहट देख, शोक-शिकायत से बुझे चेहरों या ज्ञान-गुरूत्व से लदे चेहरों पर भी बिना टिकट कटाए मुस्कुराहट तैर जाती है।

इमैनुएल ऐसा ही था। नाइजीरिया का रहनेवाला। शुद्ध अफ़्रीकी,काला। उम्र कोई तीस-पैंतीस के बीच। लंबा क़द-भरा बदन-गोल चेहरा। हरदम रात में दिखता कैंटीन में। कोट-पैंट में बना-ठना। कभी कैंटीन के काउंटर पर बैठा रहता, कभी खाने-पीने की चीजों का ध्यान रख रहा होता। और नज़र मिलती नहीं कि मासूम मुस्कुराहट के साथ पूछ बैठता - "हेल्लो माई फ़्रेंड, हाउ आर यू?"

उसकी मुस्कुराहट को सब नोटिस करने लगे थे। इतना कि हम मज़ाक में कहते - अगर कल कोई आकर कहे कि इमैनुएल मर गया, तो भी हम उसका मुस्कुराता ही हुआ चेहरा याद करेंगे...और मुस्कुराएँगे।

कैंटीन में काम तो बहुत लोग करते थे - गोरे-काले, मर्द-औरत, यूरोपियन-एशियन-अरब-अफ़्रीकन। लेकिन इमैनुएल में कुछ ख़ास था। वो बला का मेहनती था। उसके हाथ में अक्सर कोई किताब रहती या अख़बार।

वो लॉ की पढ़ाई करता था। दिन में पढ़ाई करता और रात में कैंटीन में काम करके अपना गुज़ारा निकालता। और रात में, जो भी समय होता उसमें वो पढ़ता रहता। पिछले तीन-चार साल से देख रहे थे सब उसे, ब्रिटिश क़ानून की मोटी किताबों से जूझते। उसने बताया कि वो क्रिमिनल लॉ में स्पेशलाइज़ कर रहा है।

मगर इमैनुएल के साथ संपर्क तो उसी तरह का था जैसा कि अख़बार-मैग्ज़िन,सब्ज़ी-समोसा लेनेवालों के साथ होता है। चाहे बरसों एक ही दूकान से सब्ज़ी लेते हों, हफ़्ते में दो-तीन दिन मिलते हों, लेकिन रहता तो वो स्टोरवाला ही है-तरकारीवाला ही है, संबंध तो नहीं बन जाता उससे? तो इमैनुएल भी कैंटीनवाला ही था। कितनी बात होती? हाय-हेलो-थैंक्यू, या बहुत हुआ तो - आज ठंड है-आज गर्मी है, एक घंटे में शिफ़्ट ख़त्म हो जाएगी-आज मेरी अंतिम नाइट शिफ़्ट है...इसी तरह के वाक्यों में बँधी बातें होती थीं इमैनुएल से। पिछले तीन-चार साल से।

इस साल के पहले हफ़्ते की बात है। रात के दो बज रहे होंगे। काम ख़त्म कर कैंटीन भागा। जल्दी से कुछ हल्का-फुल्का बटोरने। भूख लगी थी, काम के चक्कर में खा नहीं पाया था ठीक से। घर लौटकर सीधे खाट पर कंबल तान लूँ, इसलिए सोचा पहले कैंटीन से कुछ दाना चुग लिया जाए।

तभी देखा कैंटीन में एक टेबुल पर काले फ़्रेम में रखी एक तस्वीर रखी है। एक डायरी भी है साथ में, उसपर कलम रखी है। मैंने तस्वीर को देखा - वहाँ इमैनुएल का चेहरा था। मुस्कुराता हुआ। कुछ देर देखता ही रह गया उसे। फिर तस्वीर के बगल में कुछ पंक्तियाँ लिखी देखीं। उनमें बताया गया कि क्रिसमस के दौरान इमैनुएल बीमार हो गया था। वो उबर नहीं पाया। उसकी मृत्यु हो गई।

मैं कैंटीन से चुपचाप वापस चला आया। ना डायरी में संदेश लिखा, ना उसकी तस्वीर देखी।

मुझे रह-रहकर मज़ाक में बोली अपनी बात याद आ रही थी - "कल कोई आकर कहे कि इमैनुएल मर गया, तो भी हम उसका मुस्कुराता ही हुआ चेहरा याद करेंगे...और मुस्कुराएँगे।"

मुझे इमैनुएल का मुस्कुराता चेहरा ही याद आया...लेकिन मैं मुस्कुरा ना सका...शायद इमैनुएल होता तो मुस्कुराता...बेबात मुस्कुराता...

Tuesday 8 January 2008

सिमरिया का सचः हुँकार का तिरस्कार

रामधारी सिंह दिनकरकविता क्या है?...किसी धीर-गंभीर-चिंताजीवी-चिंतनजीवी से लगनेवाले प्राणी से ये सवाल किया जाए तो उत्तर में आत्मानुभूति-अनूभुति, अभिव्यक्ति-आत्माभिव्यक्ति आदि भारी-भरकम शब्दों के इर्द-गिर्द रहनेवाला एक उत्तर मिलने की संभावना सौ नहीं तो निन्यानवे प्रतिशत तो अवश्य रहेगी।

लेकिन सामान्य प्राणियों की दुनिया में बिल्कुल नीचे से शुरू किया जाए तो किसी छुटके से स्कूली बच्चे के लिए कविता क्या है?...वो छुटकू तो तब अपने भाव को व्यक्त भी नहीं कर सकता। लेकिन थोड़ी उम्र होने पर शायद इस तरह की कुछ परिभाषा आएगी कि – "कविता कुछ ऐसी पंक्तियाँ थीं जिन्हें रटकर उगलना ज़रूरी था, ताकि परीक्षा में पास हुआ जा सके"।

थोड़ा ऊपर की श्रेणी में जाएँ, जब छुटकू एक टीनएजर या किशोर बन जाता है, तो उसके लिए कविता ‘साहित्य-सरिता’ या ‘भाषा-सरिता’ जैसी पाठ्य-पुस्तकों में शामिल ऐसी पंक्तियाँ बन जाती हैं, जिनको रटने से ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है, उनकी व्याख्या को रटना। कवि ने कविता क्यों लिखी, इसको समझना...या रटना। वो भी गेस के हिसाब से, कि पिछले साल निराला की ‘भिक्षुक’ आ गई थी इसलिए उसे पढ़ना बेकार है। इस साल तो दिनकर की ‘शक्ति और क्षमा’ या बच्चन की ‘पथ की पहचान’ में से कोई एक लड़ेगी...फिर स्कूली शिक्षा समाप्त, जबरिया कविता की पढ़ाई समाप्त!

लेकिन छुटकू जब बड़ा होकर कॉलेज में आता है तो भी कविता से ख़ुदरा-ख़ुदरी वास्ता पड़ता ही रहता है। मसलन कोई वाद-विवाद प्रतियोगिता हो, कोई लेख हो, तो उसमें छौंक लगाने के लिए कहीं से छान-छूनकर दो-चार पंक्तियाँ लगाने के लिए कविता की आवश्यकता पड़ती है। एक तो भाषण में, लेख में चार चाँद लग जाएँगे, ऊपर से इंप्रेशन भी जमेगा, कि लड़का पढ़ने-लिखनेवाला है।

कुछ इसी तरह के माहौल में दिनकर जी की कविताओं से मेरा परिचय हुआ। स्कूली दिनों में दिनकर जी की कौन-सी कविता पढ़ी, बिल्कुल याद नहीं, ये भी हो सकता है कि उस साल दिनकर जी की कविता गेस में नहीं हो, इसलिए देखी तक नहीं। अलबत्ता एक लड़का था स्कूल में, जिसके बारे में चर्चा थी या कोरी अफ़वाह, कि वो दिनकर जी का नाती है। मैं भी लड़के को देखकर आया, लेकिन मुझे उसमें, एक छात्र - जो अपढ़ाकू था, एक क्रिकेटर - जो अगंभीर खिलाड़ी था और एक वाचाल - जिसकी भाषा अश्लील थी, इसके सिवा कुछ ना दिखा। मगर हुआ ये कि दिनकर मेरे लिए पहेली अवश्य बन गए, बल्कि दिनकर जी का पहला इंप्रेशन तो निहायती अप्रभावकारी सिद्ध हुआ।

बहरहाल, कॉलेज के दिनों में भाषण और लेख में छौंक डालने के अभियान के दौरान मुझे कविता क्या है...इस प्रश्न का उत्तर मिल गया। कविता मेरे लिए कुछ वे पंक्तियाँ बन गईं जो आपको हिलाकर रख दे, एक छोटा-सा ही सही, मगर झटका ज़रूर दे, आपकी तंद्रा भंग कर दे, आपको आत्मशक्ति दे, आपका नैतिक विश्वास डगमग ना होने दे, आपको एक अच्छा इंसान बनाने में मदद करे। और कविता की इस शक्ति से मेरा साक्षात्कार कराया दिनकर जी की कविताओं ने, जिनका एक कथन बाद में पढ़ा कि –

“कविता गाकर रिझाने के लिए नहीं बल्कि पढ़कर खो जाने के लिए है”


तब पढ़ी हुईं उनकी कुछ पंक्तियाँ ऐसे ही याद हो गईं, बिना रट्टा मारे! छोटे-छोटे काग़ज़ के पर्चों पर स्केच पेन से लिखकर उनकी इन कुछ पंक्तियों को साथ रखा करता था –

“धरकर चरण विजित श्रृंगों पर, झंडा वही उड़ाते हैं,
अपनी ही ऊँगली पर जो, खंजर की ज़ंग छुड़ाते हैं,
पड़ी समय से होड़, खींच मत तलवों से काँटे रूककर,
फूँक-फूँक चलती ना जवानी, चोटों से बचकर, झुककर.”


और एक कविता से कुछ पंक्तियाँ थीं –

“तुम एक अनल कण हो केवल,
अनुकूल हवा लेकिन पाकर,
छप्पड़ तक उड़कर जा सकते,
अंबर में आग लगा सकते,
ज्वाला प्रचंड फैलाती है,
एक छोटी सी चिनगारी भी.”


एक और कविता थी –

“तुम रजनी के चाँद बनोगे, या दिन के मार्तंड प्रखर,
एक बात है मुझे पूछनी, फूल बनोगे या पत्थर?
तेल-फुलेल-क्रीम-कंघी से नकली रूप सजाओगे,
या असली सौंदर्य लहू का आनन पर चमकाओगे?”


पता नहीं साहित्य के धुरंधरों की दुनिया में इन पंक्तियों का कितना महत्व है, लेकिन एक सामान्य छात्र की सामान्य दुनिया में ये पंक्तियाँ कई कमज़ोर पलों का सहारा बनीं।

फिर छह साल बाद, काम करते समय, एक नए संगठन में आया तो एक दिन एक पुराने वरिष्ठ सहयोगी से पूछा कि क्या किसी ने कभी दिनकर जी से कोई इंटरव्यू लिया था जो मैं सुन सकूँ। पता चला कि एक प्रख्यात प्रस्तुतकर्ता ने एक बार दिनकर जी का इंटरव्यू लिया था और उसकी कॉपी उनके पास होनी चाहिए। प्रस्तुतकर्ता तबतक अवकाश प्राप्त कर चुके थे मगर बीच-बीच में दफ़्तर आते थे। आख़िर मैंने एक दिन उनसे अपनी इच्छा बताई, और मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा जब कुछ ही दिन बाद उन्होंने बिना किसी मान-मनौव्वल के अपनी जानी-पहचानी मुस्कुराहट के साथ दिनकर जी के इंटरव्यू का एक कैसेट लाकर मुझे सौंप दिया और ये भी बताया कि दिनकर जी का डील-डौल और व्यक्तित्व कितना प्रभावशाली था। इस घटना के कुछ अर्से बाद उस उदार प्रस्तुतकर्ता का स्वर्गवास हो गया। उनका वो अमूल्य उपहार, एक आशीष के रूप में आज भी मेरे पास रखा है।

अब दिनकर जी की क़द-काया के बारे में तो मैं दूसरों से ही सुन सकता था, लेकिन उनकी आवाज़ सुनने का मौक़ा मेरे सामने प्रस्तुत था। और सचमुच दिनकर जी की आवाज़ में वही गर्जना थी, वही तेज़, वही आह्वान जो उनकी कविताओं में महसूस किया जाता रहा है...

“सुनूँ क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा, कि स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं...” (स्कूली दिनों में सुना था कि एक किसी चटकारे प्रसंग में दिनकर जी ने ख़ुद कहा, या उन्हें किसी ने कहा इसी कविता के संदर्भ में दिनकर जी के गाँव का नाम लेते हुए कि – सुनूँ क्या बंधु मैं गर्जन तुम्हारा, कि स्वयं सिमरिया का भूमिहार हूँ मैं...)

दिनकर जी की ओजस्वी वाणी आप यहाँ क्लिक कर सुन सकते हैं (साभारः बीबीसी हिंदी सेवा)

तो इस तरह टुकड़ों-टुकड़ों में दिनकर जी से नाता बना रहा। कभी “रश्मिरथी”, तो कभी “कुरूक्षेत्र”, तो कभी “हुँकार” को उलटता-पलटता रहा। “संस्कृति के चार अध्याय” को भी पढ़ गया जिसके आरंभ में नेहरू जी के साथ बेलाग ठहाका लगाते हुई उनकी तस्वीर है। ( पुस्तक में दिनकर जी ने नेहरू जी की "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया" के प्रति आभार व्यक्त किया है, जिसपर नेहरू जी ने पुस्तक विमोचन के समय कहा - इसमें तो आधा मेरा है...और दिनकर जी ने इसपर जवाब दिया - पूरा ही आपका है...जिसपर नेहरू जी ठहाका लगाकर हँस पड़े।)

लेकिन मन में इच्छा थी उस माटी को देखने की जिसने दिनकर जी को पैदा किया, पाला-पोसा, आशीष दिया। ये इच्छा पूरी हुई पिछले ही साल दिसंबर में जब काम के सिलसिले में बेगूसराय गया। बरौनी ज़ीरो माइल पर दिनकर जी की मूर्ति लगी है, वहाँ से राजेंद्र पुल की ओर बढ़ने पर बीहट बाज़ार के पास एक बड़ा सा गेट दिखा जिसपर दिनकर द्वार लिखा था, और उनकी कुछ कविताएँ भी लिखीं थीं। मैं रोमांच से भर उठा, राष्ट्रकवि दिनकर का गाँव, सिमरिया!

दिनकर जी का पैतृक घर
(सिमरिया गाँव में दिनकर जी का पुश्तैनी घर...अब ये निशानी भी केवल चित्रों तक ही महदूद रह गई है...हाशिए पर रहकर पावन लड़ाई में जुटे भाई रेयाज़ ने पिछले दिनों दिनकर जन्मशती पर सिमरिया में एक समारोह से लौटकर बताया कि दिनकर जन्मस्थली के जीर्णोद्धार के नाम पर इन खंडहरों को ज़मींदोज़ कर दिया गया...एक और सरकारी प्रपंच???)

चरपहिया गाड़ी गेट के नीचे से सरसराते हुए आगे निकली लेकिन कुछ ही दूर जाकर हिचकोले खाने लगी। रास्ता कच्चा पहले से था, या पक्का होने के बाद फिर से कच्चा जैसा लगने लगा था, ये बताना बेहद मुश्किल था। मगर रास्ते का रंग देखकर तो यही लग रहा था कि वो ना पक्का था-ना कच्चा, खरंजे वाली सड़क थी जिसमें शायद ईंटे बिछाई गई थीं किसी ज़माने में जो अब घिस चुकी थीं और अब उनपर धूल और मिट्टी का राज था। रास्ते के दोनों तरफ़ खेत थे, जो तब भी वैसे ही रहे होंगे जब दिनकर इन रास्तों से गुज़रे होंगे। मन था कि खेत, धूल-मिट्टी तथा आते-जाते लोगों, गाड़ी को निहारते बच्चों से डायरेक्ट आँखें मिलाऊँ लेकिन तेज़ उड़ती धूल के कारण गाड़ी का शीशा चढ़ाना ही पड़ा। गाड़ी हिचकोले खाते, धूल के बादल से लड़ती हुई आगे बढ़ती रही, मैं शीशे के पीछे से कभी आगे-कभी दाएँ-कभी बाएँ निहारता रहा। लेकिन रास्ता था कि ख़त्म होने का नाम ही ना हो और मैं सोच रहा था कि पता नहीं तब के ज़माने में दिनकर जी कैसे मुख्य सड़क पर आते होंगे क्योंकि तब क्या, अभी के दिनों में भी सिमरिया जैसे बिहार के गाँवों में अधिकांश लोगों के लिए नियमित बाज़ार तक आने-जाने का सबसे सुलभ साधन अपने ही पाँव हुआ करते हैं, या बहुत हुआ तो साइकिल।

आख़िर चरपहिया गाड़ी में बैठकर की गई एक लंबी सी प्रतीत हुई यात्रा के बाद हम पहुँच ही गए – दिनकर के जन्मस्थान। भारत में कवियों-लेखकों-कलाकारों के जन्मस्थानों की दशा पर जिसतरह की रिपोर्टें अक्सर आती रहती हैं, उनसे मुझे ये तो कतई उम्मीद नहीं थी कि दिनकर जी की जन्मस्थली पर उसतरह का कुछ भव्य होगा जैसा कि इंग्लैंड में हुआ करता है।

इंग्लैंड में विलियम शेक्सपियर, जॉन मिल्टन, विलियम वर्ड्सवर्थ, चार्ल्स डिकेंस, जेन ऑस्टन आदि लेखकों-कवियों के जन्मस्थल-मरणस्थल से लेकर उनसे जुड़े दूसरे पतों की भी एक विशेष पहचान रखी गई है। दूर-दूर से लोग देखने आते हैं, कि अमुक पते पर, अमुक हस्ती जन्मा-मरा, या इतना समय बिताया, या कि वहाँ रहकर फ़लाँ कृति लिखी, आदि-इत्यादि। और तो और लंदन में तो आर्थर कॉनन डॉयल के विश्वविख्यात चरित्र शर्लक होम्स के नाम पर भी एक म्यूज़ियम बना है, बेकर स्ट्रीट के उसी पते पर जो कहानियों में उसका ठिकाना है। और ये तब जबकि शर्लक होम्स एक काल्पनिक चरित्र है। वैसे ये अलग बात है कि इन सारे स्थलों को देखने के लिए टिकट कटाना पड़ता है, लेकिन जिस प्रकार की व्यवस्था वहाँ है उसके लिए पैसे तो लगने स्वाभाविक हैं, इसलिए लोग टिकट कटाकर शेक्सपियर और जेन ऑस्टन के जन्मस्थलों और समाधियों को देखने जाते हैं।

बहरहाल सिमरिया में ब्रिटेन सरीखी किसी व्यवस्था की तो मुझे उम्मीद नहीं थी, लेकिन जो दिखा उसकी भी कहीं से कोई उम्मीद नहीं थी।

वो कमरा जहाँ दिनकर जी का जन्म हुआ था
(ऊपर जो बिना पल्लों की चौखट, चौखट से लटकता बदनसीब ताला, जंग से लड़ती खिड़कियों की सलाखें, बदरंग और कमज़ोर पड़ चुकी दीवारों और झाड़-झंखाड़ से घिरा कमरेनुमा खंडहर नज़र आ रहा है...सिमरियावासी उसे दिनकर जी का गर्भगृह कहते हैं, वो कमरा जहाँ 23 सितंबर 1908 को दिनकर उगे थे, अब ये सब भी नहीं रहा!!!)


दिनकर के जन्मस्थल की एक-एक दरकती-जर्ज़र ईंट भारत में साहित्यकारों के साथ किए जानेवाले बर्ताव की जीती-जागती कहानी हैं! भरभराती-गुमसाई दीवारों के बीच से ले जाकर मुझे एक कमरा ये कहते हुए दिखाया गया कि यही वो गर्भगृह है जहाँ दिनकर का जन्म हुआ था। अब उस कमरे की हालत ऐसी कि सिर ऊपर करो तो साक्षात दिनकर यानी सूर्यदेवता के दर्शन हो जाएँ क्योंकि छत का नामोनिशान मिट चुका था। और दिलचस्प ये कि गर्भगृह में पता नहीं किस कारण से, दरवाज़े की चौखट में लगी साँकल में ताला लगा था। आश्चर्य की बात ये थी कि जिस कमरे की भुसभुसाई चौखट में झूलती जंग लगी साँकल में उतना ही ज़ंग लगा ताला झूल रहा था, उस दरवाज़े के पल्ले ही नदारद थे! अलबत्ता बदहाल घर के बाहर एक चमचमाते काले संगमरमर की एक पट्टिका दिखी जिसपर लिखा था – ‘15 जनवरी 2004 को बरौनी रिफ़ाइनरी के सौजन्य से राष्ट्रकवि की जन्मस्थली के उन्नयन कार्य का श्रीगणेश हुआ’। शायद भगवान गणेश भी अपनी बदनामी पर आहत हो रहे होंगे!

दिनकर के जन्मस्थल की ये दुर्दशा देखकर विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि लगभग सौ साल पहले सचमुच यहाँ साहित्य का एक ऐसा प्रखर दिनकर जन्मा था जिसकी आभा से सारा राष्ट्र आलोकित हुआ।

सिमरिया में दिनकर जी की पीढ़ी के कुछ लोगों का कहना था कि राष्ट्रकवि बनने के बाद भी दिनकर का सिमरिया से नाता टूटा नहीं था। लोगों ने बताया कि दिनकर जी के अपने रिश्तेदार अब पटना में रहा करते हैं। पटना में दिनकर जी के घर का या किसी अन्य स्मृति-स्थल का तो पता नहीं, वैसे एक दिनकर मूर्ति अवश्य है राजेंद्र नगर के पास, जिसका ज़िक्र अब केवल पता बताने के एक प्वाइंट के तौर पर हुआ करता है।

बात समझ में बिल्कुल नहीं आती कि दिनकर जी के घर की ऐसी हालत क्यों है। दिनकर जी स्वयं भी तीन-तीन बार राज्यसभा के सांसद रहे थे, फिर ये हाल कैसे है, क्योंकि आज के दिन में तो ये बात अपचनीय है कि किसी पूर्व सांसद का घर बेहाल हो। दिनकर जी के गाँव में, उनका जो टूटा-फूटा घर बचा है उसके चारों तरफ़ के सारे घर पक्के हैं। केवल एक घर कच्चा है – दिनकर का घर।

लेकिन शायद गाँधीवाद को स्वीकार करने के बावजूद युवाओं को विद्रोह की राह दिखाने के कारण स्वयँ को एक ‘बुरा गाँधीवादी’ बतानेवाले दिनकर संसद में पाँव रखकर भी नेता नहीं बन सके।

कैमरे में तस्वीरें, और मन में एक मायूसी लिए मैं वापस जाने के लिए तैयार हुआ। ये सोचता कि अगर राष्ट्रकवि के जन्मशती वर्ष में उसके जन्मस्थल का ऐसा तिरस्कार हो सकता है तो राष्ट्र के अन्य कवियों की कहानी बताने की आवश्यकता नहीं रह जाती है।

दनकर जी के घर के अहाते में खड़ी पट्टिका

(काले संगमरमर की ये पट्टिका दिखती है दिनकर जी के घर के अहाते में...बीमार की देह पर मोतियों के हार के समान...पता नहीं अपनी चमचमाहट पर अकड़कर चुप है, या आस-पास छाई बदहाली ने सकते में डाल दिया है...पट्टिका मगर ख़ामोश है!!!)

मैं दिनकर के जन्मस्थल पर कोई रिपोर्ट करने के इरादे से कतई नहीं गया था। रिपोर्ट मेरे दूसरे सहयोगी कर रहे थे। दिनकर मेरे लिए 'स्टोरी' भर नहीं थे। लेकिन मेरे साथ सफ़र कर रहे एक स्थानीय पत्रकार को लगा कि शायद मैं कोई ‘स्टोरी’ ढूँढ रहा हूँ, इसलिए उसने मुझसे कहा – ‘आए हैं तो यहाँ एक रिपोर्ट कर लीजिए, एक चरवाहा है जो भइंसी भी चराता है और दिनकर जी की कविताएँ भी सुनाता है।’

मैंने धन्यवाद देकर उस सज्जन से कहा – ‘ना ठीक है, आप कर लीजिए।’

पत्रकार ने कहा – ‘हम तो पहले ही कर चुके हैं, सहारा-ईटीवी सबपर आ चुका है।’

मैंने कहा – ‘तो ठीक ही है, हो तो चुका है।’

पत्रकार ने हिम्मत नहीं हारी और कहा- ‘एक और कहानी है, पास में नौ साल का एक बच्चा है जो बड़ा-बड़ा आदमी को उठाकर बजाड़ देता है।’

मैंने मुस्कुराकर ना की मुद्रा में सिर हिला दिया और गाड़ी में बैठा। पीछे एक तिराहे पर दिनकर जी की, शीशे में चारों ओर से घिरी, एक साफ़-स्वच्छ स्वर्णिम मूर्ति, मौन मगर मुस्कुराती, हमारी गाड़ी को जाते देख रही थी। कुछ ही पलों में गाड़ी के चारों चक्के फिर कच्ची सड़क पर हिचकोले खाने लगे। धूल-मिट्टी उड़ने लगी। शायद नृत्य कर रही थी वो माटी भी, अपने ही एक सपूत की लिखी इस कविता की धुन में खोई -

“मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का,
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी,समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं.”

Tuesday 1 January 2008

नए साल पर पुरानी बहस?

नए साल पर अधिकतर बहस पीने-पिलाने की बढ़ती परिपाटी को लेकर चल रही है तो आइए पहले एक दिलचस्प वाक़ए से ही शुरूआत करें...

घटना पाकिस्तान की है। पाकिस्तान के जन्म से लेकर उसके सठियाने तक की उम्र तक के गिने-चुने लोकप्रिय राजनेताओं में से एक थे ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो। भुट्टो साहब ज़मींदार घराने से आते थे, विलायत की हवा खा चुके थे, तो शराब अपने-आप ज़िंदगी का हिस्सा बन गई। स्कॉच व्हिस्की उनकी फ़ेवरिट थी।

राजनीति में भुट्टो साहब ने एक साथ मुल्लों को भी ललकारा और मिलिटरी को भी। लोकप्रियता का आलम ये था कि जनता उनके साथ थी, मुल्लों को भी डर लगा और मिलिटरी को भी। तो साम-दाम-दंड-भेद का ज़ोर लगने लगा, भुट्टो को दबाने के लिए।

मुल्लों ने भुट्टो के ख़िलाफ़ हवा बनानी शुरू की - शराब पीने जैसा कुफ़्र करनेवाला इस्लाम की हिफ़ाज़त कर सकेगा?

लाहौर में एक रैली हुई। और भाषणकला के माहिर भुट्टो ने वहाँ मुल्लों पर जवाबी वार किया। बोले - "वो कहते हैं मैं शराब पीता हूँ।...हाँ, मैं खुलेआम ये कहता हूँ कि मैं शराब पीता हूँ।...लेकिन...वे क्या पीते हैं?...वे तो इंसानों का ख़ून पीते हैं!"

जनसैलाब अपने नेता की हाज़िरजवाबी पर लुट गया। नया नारा ही बन गया - जीवे-जीवे भुट्टो जीवे...पीवे-पीवे भुट्टो पीवे...

भुट्टो जीते मगर जी नहीं सके। मिलिटरी ने उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया।

घटना बताने के पीछे मेरा उद्देश्य एक सवाल को खड़ा करना है - क्या शराब पीने भर से ही किसी को अच्छा या ख़राब घोषित किया जाना चाहिए? क्या एकमात्र इसी आधार पर किसी को पसंद-नापसंद करनेवाले अपने आप मुल्लों की जमात में खड़े नहीं हो जाते?

शराबख़ोरी को अच्छा-बुरा ठहराने पर बहस की आवश्यकता है ही नहीं। सिगरेट-शराब एक व्यसन है, व्यसन अच्छी चीज़ नहीं होती, ये सिगरेट-शराब के पैकेटों पर वैधानिक चेतावनियाँ पढ़ने के बाद उनका सेवन करनेवाला भी जानता है, नहीं करनेवाला भी जानता है। ये बेबहस सत्य है। ऐसा तो कतई नहीं कि इस नए साल पर शुरू कर दी गई बहस से पहले ये बात किसी को पता नहीं थी।

मगर इस सत्य से बड़ा एक ध्रुवसत्य ये है - अति सर्वत्र वर्जयेत। कोई भी चीज़ एक सीमा में ही अच्छी लगती है। फिर चाहे शराब पीने की अति हो, या मुल्लों की मौलवीगिरी की या पंडितों की पंडिताई की - फ़र्क़ नहीं पड़ता।

शराब के नशे पर बहस करने से अधिक आवश्यक है आज दूसरे नशों पर बहस करने की जिनकी तुलना में शराब के नशे का असर कुछ भी नहीं।

वो है - मैटेरियलिज़्म यानी भौतिकतावाद का नशा और फंडामेन्टलिज़्म यानी कठमुल्लावाद का नशा। इनका नशा आज सबपर भारी पड़ रहा है। और इनकी जब अति होने लगे तो इंसान झूमता नहीं, अंधा हो जाता है।

और दिलचस्प बात ये है कि दोनों ही एक साथ फल-फूल रहे हैं, जिस कोलकाता और हैदराबाद में आज सॉफ़्टवेयर प्रोफ़ेशनलों का जमघट लगा है, उसी कोलकाता-उसी हैदराबाद में तस्लीमा नसरीन पर हमले होते हैं।

नववर्ष पर यही प्रार्थना करता हूँ कि सुख-साधन का गागर, सागर बने ना बने, मानवता का वृक्ष हरा-भरा रहे. उसके लिए तो ना गागर चाहिए-ना सागर...

नववर्ष पर बच्चन जी की पंक्तियाँ आपके साथ बाँटता चलूँ -

"मैं देख चुका था मस्जिद में,
झुक-झुक मोमिन पढ़ते नमाज
पर मेरी इस मधुशाला में,
पीता दीवानों का समाज
वह पुण्य कर्म, यह पाप कृत्य
कह भी दूँ - तो दूँ क्या सुबूत
कब मस्जिद पर कंचन बरसा
कब मदिरालय पर गिरी गाज?"